Tuesday, December 21, 2010
ईरान को लेकर भारत पर था अमेरिकी दबाव
विकिलीक्स के नए खुलासे के मुताबिक परमाणु करार पर वार्ता के दौर में अमेरिका ने ईरान को लेकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की थी। संदेशों के अनुसार ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद की भारत यात्रा से अमेरिका बेहद खफा था और उसने यहां तक कह दिया था कि इससे इससे अमेरिका के दुश्मन को मंच मिलेगा।? भारत में अमेरिका के तत्कालीन राजदूत डेविड मलफोर्ड की ओर से अमेरिकी विदेश विभाग को भेजे गए केबलों में स्पष्ट किया गया कि भारत यह नहीं चाहता कि अमेरिका यह बताए कि उसे क्या करना है? खासकर सार्वजनिक रूप से, क्योंकि वह एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करते हुए दिखना चाहता है। तत्कालीन विदेश सचिव शिवशंकर मेनन ने मलफोर्ड से कहा, इस सरकार को एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करने वाले के रूप में देखना चाहिए जो अमेरिका से मिले निर्देशों का पालन नहीं करता। चर्चा के बहाने विदेश यात्रा के प्रयास में था भारतीय अधिकारी : विकिलीक्स की ओर से सार्वजनिक किए गए अमेरिकी संदेशों से खुलासा हुआ कि वर्ष 2007 में एक वरिष्ठ भारतीय अधिकारी ने ईरान पर चर्चा के बहाने अमेरिका जाने के लिए नई दिल्ली स्थित दूतावास में संपर्क किया था। संदेशों के अनुसार राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहाकर बोर्ड (एनएसएबी) के तत्कालीन सदस्य केवी राजन ने चार मई 2007 को अमेरिकी दूतावास मामलों के प्रभारी ज्योफ्रे प्यॉट से आपात मुलाकात की और उन्हें बताया था कि ईरान सरकार भारतीय बुद्धिजीवियों को अमेरिका विरोधी बनाने की कोशिश कर रही है। विदेश मंत्रालय के पूर्व अधिकारी राजन ने कहा कि मनमोहन सिंह सरकार को प्रभावित करने के लिए ईरानी दूतावास ने राजनेताओं, विद्वानों और टिप्पणीकारोंको मुफ्त में यात्रा कराने की उनसे पेशकश की थी। हालांकि राजन के इस खुलासे पर प्रतिक्रिया नहीं मिल पाई है। इन दस्तावेजों के अनुसार ईरान के इस कदम के खिलाफ राजन ने अपने लिए बतौर एनएसएबी सदस्य 14 मई से पांच से सात दिनों के लिए अमेरिका की यात्रा का प्रस्ताव रखा था ताकि वह अमेरिकी अधिकारियों, थिंक टैंक, और खुफिया बिरादरी से बातकर ईरान पर अमेरिकी समझ को अच्छी तरह समझ पाए। इन दस्तावेजों में कहा गया, उन्हें उम्मीद थी कि एनएसएबी में ईरान नीति विकल्प पर चर्चा में अमेरिकी दृष्टिकोण को पेश करते। खुलासे के अनुसार अमेरिका इस यात्रा पर राजी भी हो गया था, लेकिन राजन ने अंतिम क्षण में इसे रद्द कर दिया। बांग्लादेशी खुफिया एजेंसी ने किया हूजी का समर्थन : बांग्लादेश की एक खुफिया एजेंसी ने इस्लामी आतंकी संगठन के उस विचार का समर्थन किया था, जिसके तहत उसने एक राजनीतिक पार्टी के गठन की कोशिश की थी। यह घटना दो वर्ष पहले की है। उस समय बांग्लादेश में सैन्य समर्थित सरकार सत्ता में थी। यह जानकारी मीडिया ने शुक्रवार को विकिलीक्स के हवाले से दी। समाचार एजेंसी डीपीए के अनुसार बांग्लादेश की एक निजी वेबसाइट बीडीन्यूज24डॉटकाम पर प्रकाशित दस्तावेजों में कहा गया है कि डायरेक्टोरेट जनरल ऑफ फोर्सेज इंटेलीजेंस ने प्रतिबंधित इस्लामी संगठन हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी की राजनीतिक शाखा के गठन का समर्थन किया था। उस समय बांग्लादेश में (2007-2008) अंतरिम सरकार का शासन था। अमेरिकी दूतावास से भेजे गए संदेश के अनुसार 2008 के आम चुनाव से पहले इस्लामिक डेमोक्रेटिक पार्टी के गठन की कोशिश की गई थी। बांग्लादेश निर्वाचन आयोग ने उस समय इस मामले को लेकर हुई व्यापक आलोचना के कारण पार्टी के पंजीकरण का आवेदन खारिज कर दिया था। अमेरिकी दूतावास ने इस इस्लामी संगठन की राजनीतिक शाखा के गठन का सख्त विरोध किया था, क्योंकि दूतावास का मानना था कि यह संगठन अमेरिकी मिशन या उसके हितों के खिलाफ हिंसक कार्रवाई कर सकता है और आतंकी गतिविधियों को अंजाम देने और उनका समर्थन करने में संगठन की क्षमता को बढ़ा सकता है। बांग्लादेश की अन्य खुफिया एजेंसी, नेशनल सिक्युरिटी इंटेलिजेंस ने भी इस पर चिंता व्यक्त की थी कि इस पार्टी के गठन से उग्रवादियों को एक उदारवादी मोर्चे की आड़ में आतंकी गतिविधियां चलाने की आजादी मिल जाएगी। 2007 में भारतीय राजनयिक ने बताई थी श्रीलंका की स्थिति बेहद खराब : श्रीलंका में लिट्टे की सेना के हाथों पराजय के लगभग दो साल पहले भारत के शीर्ष अधिकारी ने अमेरिकी राजनयिक से कहा था कि वहां की स्थिति अत्यधिक खराब है। विकिलीक्स पर जारी एक अमेरिकी संदेश में तीन साल पहले विदेश मंत्रालय के एक अधिकारी के हवाले से कहा गया है कि श्रीलंका की स्थिति काफी खराब है। संदेश में यह भी कहा गया है कि सरकार और बागियों दोनों के मन में ही अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रति कोई सम्मान नहीं है। अप्रैल 2007 के इस संदेश में अमेरिकी दूतावास के एक अधिकारी और विदेश मंत्रालय में संयुक्त सचिव मोहन कुमार के बीच हुई बातचीत का जिक्र है, जिसमें दोनों श्रीलंका सरकार और लिट्टे के बारे में बात कर रहे हैं। संदेश के मुताबिक श्रीलंका की सरकार और लिट्टे के मन में अंतरराष्ट्रीय समुदाय के प्रति कोई सम्मान नहीं है। कुमार श्रीलंका में उपउच्चायुक्त रह चुके हैं और माना जाता है कि वह वहां की स्थिति के बारे में काफी जानकारी रखते हैं। इस बारे में कोलंबो में अमेरिकी दूतावास ने कहा कि प्रकाशित संदेश अमेरिकी विदेश नीति का प्रतिबिंब नहीं है, वहीं श्रीलंका सरकार ने कहा कि वह इन दस्तावेजों का अध्ययन कर रही है। एक जैसा काम करते हैं भारतीय-अमेरिकी राजनयिक : स्वीडिश वेबसाइट विकिलीक्स द्वारा खुफिया दस्तावेजों के सार्वजनिक होने सेउठे विवादों के बाद अमेरिका ने सफाई दी है। ओबामा प्रशासन ने कहा है कि भारत में उनके राजनयिक उसी तरह काम कर रहे हैं, जैसे उनके समकक्ष यहां यानी अमेरिका में करते हैं। अमेरिकी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता पीजे क्राउले ने कहा, हमारे राजनयिक भारत में वैसा ही काम कर रहे हैं जैसा भारतीय राजनयिक हमारे देश में करते हैं। उनकी यह प्रतिक्रिया विकिलीक्स द्वारा नई दिल्ली स्थित अमेरिकी दूतावास से जुड़े कई दस्तावेज सार्वजनिक होने के बाद आई है। प्रवक्ता ने कहा, हम भारत के साथ सामरिक भागीदारी कर रहे हैं। कई मुद्दों पर हमारा भारत सरकार और वहां के लोगों का सहयोग है। पाक के अधिकारी ने 26/11 के बाद भारत को सराहा : दिल्ली स्थित पाकिस्तान उच्चायोग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने मुम्बई हमले के बाद की स्थिति को जिम्मेदाराना और परिपक्व ढंग से संभालने के लिए भारत की सराहना की थी। विकिलीक्स की ओर से जारी गोपनीय दस्तोवजों में यह खुलासा किया गया है। इन दस्तावेजों के अनुसार इस पाकिस्तानी अधिकारी ने भारत की इस बात के लिए सराहना की थी कि उसने काबुल में भारतीय दूतावास पर हमले के बाद जो कदम उठाया था उसकी तुलना में मुम्बई हमले के उसने ज्यादा जिम्मेदाराना और परिपक्वता का परिचय दिया। इन दस्तावेजों में ऐसा कहने वाले पाकिस्तानी अधिकारी का नाम नहीं दिया गया है। तत्कालीन राजदूत डेविड मलफोर्ड के हस्ताक्षर वाले इस गोपनीय संदेश में भारतीय मीडिया में पाकिस्तान स्थित आतंकवादी शिविरों के खिलाफ बदले की कठोर कार्रवाई की उठ रही मांग का भी जिक्र है। इन गोपनीय दस्तावेजों के अनुसार काबुल दूतावास पर हमले के पीछे तुरंत पाक खुफिया एजेंसी आइएसआइ का हाथ बताए जाने को पाकिस्तानी अधिकारी ने भारत का आवेगपूर्ण और राजनीतिक रूप से प्रेरित कदम बताया। यह संदेश एक दिसंबर, 2008 का है। पाक अधिकारी ने कहा भारतीय मीडिया ने यह दर्शाया कि कैसे मुंबई हमले से द्विपक्षीय संबंध प्रभावित होगा और यह सनसनीखेज रिपोर्ट कुछ महीनों तक चलती रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि भारतीय मीडिया ने मुंबई हमले की जांच में सहयोग के लिए आइएसआइ प्रमुख अहमद पाशा को दिल्ली आने की प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पेशकश को बुलाने के रूप में पेश किया, जबकि इस यात्रा के बारे में हमले से पहले ही निर्णय ले लिया गया था।
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