विदेश नीति के ठोस मुद्दों पर भारत एक उभरते हुए आर्थिक, सैनिक और 'राजनीतिक दैत्य' के रूप में सामने आने पर भी इस मामले में अब भी अस्थिर, डावांडोल और संकोची है कि दुनिया में इसको कौन सी भूमिका अदा करनी चाहिए। स्वयं को शांतिपूर्वक व आत्मविश्वास के साथ पेश करने के स्थान पर-खास तौर पर उन मामलों में जिनमें अमेरिका के सम्बंधों को लेकर समझ में भिन्नताएं हैं और जिनमें भारत के महत्वपूर्ण हित दांव पर होते हैं- नई दिल्ली प्राय: वाशिंगटन के दबाव में, और कभी-कभी तो प्रतिरोध के बगैर ही, झुक जाती है
भारत सम्बंधी विकीलीक्स केबल्स के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित सार- संक्षेप ने तूफान बरपा कर दिया है। इनमें सबसे सनसनीखेज खुलासा 2008 की जुलाई के 'वोट दो-नकद लो' की बदनामी को लेकर है। उस समय भारत-अमेरिकी न्यूिक्लयर सहयोग समझौते को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के अस्तित्व को दांव पर लगा दिया था। उनकी अल्पमत सरकार जिन वामपंथियों के समर्थन पर चल रही थी, उन्होंने समर्थन वापस ले लिया था। उद्घाटित तथ्यों के अनुसार सरकार बचाने के लिए कांग्रेस ने अन्य पार्टियों को घूस देकर पक्ष में कर लिया। 2008 में अपने स्ंिटग आपरेशनों से टीवी चैनलों ने इसका व्यापक स्तर पर प्रचार किया था। तब इन खुलासों में मुख्य निशाना समाजवादी पार्टी को बनाया गया। अब पता चल रहा है कि राष्ट्रीय लोक दल के अजीत सिंह को भी घूस दी गई थी और यह काम कैप्टन सतीश शर्मा के एक सहायक नचिकेता कपूर के जरिये हुआ था। नचिकेता ने अमेरिकी दूतावास के एक अधिकारी को वे दो पेटियां दिखाई थीं जिनमें रालोद के सांसदों को दिए गए 50-60 करोड़ रुपयों का एक हिस्सा था। डॉ. सिंह ने अपनी सरकार का जोरदार और जुझारू बचाव करते हुए कहा कि भारत में अमेरिकी दूतावास द्वारा भेजे गए केबलों की सच्चाई, विषय-वस्तु और उनके अस्तित्व तक की पुष्टि नहीं की जा सकती है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, ''मैंने किसी को भी कोई वोट खरीदने का अधिकार नहीं दिया। मुझे वोटों की खरीद के बारे में..क़ोई जानकारी नहीं है..।'' इस कहानी को सतीश शर्मा ने भी मानने से इनकार किया और कहा कि कपूर उनका सहायक नहीं था। हालांकि इससे दाग साफ नहीं होता। विकीलीक्स पर आधारित साक्ष्य पहली दृष्टि में यह मामला तैयार करते हैं कि कि सांसद खरीदे गए थे। इसने यह पक्का कर दिया था कि 256 'ना' वोटों के खिलाफ 275 'हां' वोटों के साथ संप्रग सरकार जीत जाएगी। भारत की धरती पर 'वोट दो-नकद लो' एक गम्भीर अपराध हुआ है। इसके सहभागी विदेशी राजनयिक थे। अब सरकार कम से कम इतना तो कर ही सकती है कि पूरे मामले की जांच सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दे, और अमेरिकी दूतावास से उस कर्मचारी की पहचान करने को कहे जिसने इस करतूत को अपने केबलों के जरिये भेजा था। ऐसा न करने पर केंद्र सरकार की छवि पर और बट्टा लगेगा जो पहले से ही बहुत से घोटालों में बदनाम हुई बैठी है। इस खुलासे से भारतीय जनता पार्टी अधिकतम फायदा उठाने में जी जान से लगी है। पर टेपों से इसका चेहरा और भी गंदा होकर उभरता है। सार्वजनिक रूप से इसने न्यूिक्लयर समझौते का विरोध किया था। लेकिन विरोध को लेकर यह गम्भीर नहीं थी। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य शेषाद्रिचारी और प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने अमेरिकियों से कहा था- विदेश नीति प्रस्तावों पर अधिक ध्यान न दें। जबकि स्वयं लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने उनको आश्वस्त किया था कि सत्ता में आने पर भाजपा, अपने विरोध पक्ष के दिनों से बहुत अलग व्यवहार करेगी। भाजपा अक्सर ही शिकारी कुत्तों के साथ शिकार करती है और दौड़ती खरगोश के साथ है। इसलिए इसकी न्यूिक्लयर नीति को निर्धारित करने के भारत के अधिकार के मामले में इसको भारत- अमेरिकी समझौते का विरोध करना फायदेमंद लगा था परंतु सैद्धांतिक तौर पर पार्टी दक्षिणपंथी विदेश अैार सुरक्षा नीति पर चलती है, और शीतयुद्ध के दिनों से ही यह घोर अमेरिका समर्थक रही है। इसको भारत का भविष्य अमेरिकी आधिपत्य वाली पूंजीवादी विश्व व्यवस्था को मज़बूत बनाने में नज़र आता है। इससे भाजपा के व्यवहार में दोहरापन आ जाता है और इसकी विश्वसनीयता को भारी नुकसान पहुंचता है। परंतु विकीलीक्स के खुलासों का उतना महत्व भ्रष्टाचार और राजनीतिक अपराधों की पुष्टि के लिए नहीं है जितना कि उस दिशा को दिखाने के लिए जिसमें भारत की विदेश नीति हाल ही में चलने लग पड़ी है, और यह भी कि दुनिया, खासतौर पर अमेरिका की नज़र में भारत की घरेलू स्थिति और क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के प्रति दृष्टिकोण क्या है। इन खुलासों में आमतौर पर तरह-तरह के मामलों पर उपयोगी और कभी-कभी बहुमूल्य जानकारी होती है जैसे कि देश की पार्टियों के आपसी और उनके भीतरी सम्बंध, कश्मीर, न्यूक्लियर सौदा, आम लोगों की समझ, भारत-पाक तनाव, ईरान की न्यूक्लियर दौड़ तथा तेहरान को घेरने की अपनी योजना में भारत का समर्थन लेने के लिए भारत को धमकाने की अमेरिकी कोशिशें, और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की भारत की मांग को महज़ शोरगुल कहना। राजनयिकों द्वारा केबलों का इस्तेमाल संचार के एक रूप के तौर पर मेज़वान देश की सूचनाओं, विश्लेषणों और आकलनों को अपनी सरकारों तक पहुंचाने के लिए किया जाता है, और वे संप्रग के आपसी मतभेदों को काफी हद तक सामने लाते हैं। अफज़ल गुरु की फांसी की सज़ा को लेकर तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और कांगेस अध्यक्ष के बीच के मतभेद को सुखियरे में लाते हैं। इनमें जे.के.एल.एफ. के नेता यासीन मलिक को यह कहते उद्धृत किया गया है कि गुरु को फांसी देने से घाटी में प्रतिकूल असर पड़ेगा क्योंकि सज़ा संसद पर हमले के लिए यातायात का प्रबंध करने में मदद देने के आरोप से किसी भी तरह से मेल नही खाती है। अखबार के ये खुलासे डॉ. सिंह और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन के बीच के मतभेदों पर रोशनी डालते हैं जो पाकिस्तान के साथ साझा नियति के आधार पर बातचीत दोबारा शुरू करने को लेकर थे। नारायणन ने प्रधानमंत्री से रुखाई के साथ बोल दिया था- 'आपकी नियति साझा होगी, हमारी नहीं है।'
नारायणन के लिए अपने प्रधानमंत्री से ऐसा बोलना बेहद अनुचित था। लेकिन इससे भी ज्यादा निंदनीय तो यह बात अमेरिकी राजनयिक को बताना थी। विदेश नीति के ठोस मुद्दों पर भारत एक उभरते हुए आर्थिक, सैनिक और 'राजनीतिक दैत्य' के रूप में सामने आने पर भी इस मामले में अब भी अस्थिर, डावांडोल और संकोची है कि दुनिया में इसको कौन सी भूमिका अदा करनी चाहिए। अपने आपको शांतिपूर्वक और आत्मविश्वास के साथ पेश करने के स्थान पर- खास तौर पर उन मामलों में जिनमें अमेरिका के सम्बंधों को लेकर समझ में भिन्नताएं हैं और जिनमें भारत के महत्वपूर्ण हित दांव पर होते हैं- नई दिल्ली प्राय: वाशिंगटन के दबाव में, और कभी-कभी तो प्रतिरोध के बगैर ही, झुक जाती है। ईरान के मामले में यह खासतौर पर नज़र आता है जिसमें भारत अमेरिकी दबाव में है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में भारत ईरान के खिलाफ तीन बार वीटो का इस्तेमाल कर चुका है, जिससे सुरक्षा परिषद को इसके विरुद्ध प्रतिबंध लगाने की इजाज़त मिल गई है। ईरान के विरुद्ध वोट भारत की अपनी बेहतर सोच, और विदेश मंत्रालय के इस निष्कर्ष के भी खिलाफ थे कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी अथवा अप्रसार संधि के अंर्तगत ईरान ने अपने दायित्वों का कोई ठोस उल्लंघन नहीं किया है।
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