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Thursday, March 24, 2011

केबल अभी और भी हैं


असांजे साहब का कहना है कि रोचकता अभी और भी है। पाकिस्तान तथा चीन सम्बंधी केबल आने तो दीजिए। केबल अभी और भी हैं। वैसे रोचकता अब भी कम नहीं है। यह अलग बात है कि पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए ही ये केबल मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू की तरह हैं। केबल आया कि मणिशंकर अय्यर को पेट्रोलियम मंत्री के पद से अमेरिका ने हटवाया। बस जी, आडवाणीजी ने पूछ लिया कि हमारा मंत्रिमंडल अब क्या अमेरिका में बनने लगा है? वैसे जब विकीलीक्स नहीं था तब भी यह आरोप तो लगते ही रहते थे कि हमारी आर्थिक नीतियां अमेरिका में बन रही हैं, फिर यह भी कहा जाने लगा कि हमारा बजट वाशिंगटन में बनता है। कांग्रेस के राज में भी कहा गया, एन.डी.ए. के राज में भी कहा गया। यदि अमेरिका की मनचाही हो जाती और प्रणवदा की जगह मोंटेक सिंह अहलुवालिया वित्तमंत्री होते तो शायद अब भी कहा जा रहा होता। बहरहाल, फिर यह कहा जाने लगा कि हमारी विदेश नीति अमेरिका में बनने लगी है। इसका अर्थ यह है कि हमारे यहां होली पर चीन की बनी पिचकारी या दीवाली पर चीन की बनी रोशनी की झालरें ही नहीं चलतीं। अमेरिका में बनीं चीजें भी खूब चल रही हैं और वे चीनी माल की तरह सस्ती भी नहीं, बल्कि काफी महंगी पड़ रही हैं। खैर, अब नया आरोप यह लगाया गया कि क्या हमारा मंत्रिमंडल अमेरिका में बनने लगा है? यह आरोप वामपंथियों ने नहीं लगाया जो कि अक्सर ऐसे आरोप लगाते रहते हैं। यह आरोप तो आडवाणीजी ने लगाया। इस पर मणि ने हंसते हुए कहा कि 'मैं तो उस पद पर था ही टेंपरेरी। इतने दिन बना रहा काफी है।'
फिर केबल आया कि पिछली बार सरकार ने सांसदों को खरीदकर विश्वास मत हासिल किया था। इस सिलसिले में पहला सवाल तो यही है कि क्या इसे रहस्योद्घाटन कहा जा सकता है? क्योंकि यह तो सदा से ही एक खुला रहस्य रहा है। फिर यह खुलासा कर विकीलीक्स ने सांसदों के भाव भी गिरा दिए। अभी तक भ्रम यह था कि तब एक-एक सांसद पच्चीस करोड़ में बिका। पर विकीलीक्स ने बताया कि उनकी कीमत तो बस दस करोड़ ही थी। और संसद में तो एक ही करोड़ दिखाए गए थे, हालांकि जिक्र तीन करोड़ का आया था। खैर, इस केबल से सरकार बहुत नाराज हो गई। प्रधानमंत्री ने कहा कि मैंने तो किसी से कहा नहीं था कि सांसदों के वोट खरीद लो। वैसे तो वे सांसद थे, किसी कम्पनी के शेयर तो थे नहीं, कि वे किसी ब्रोकर को कहते कि भई मेरे लिए भी कुछ खरीद लो। पर उनके यह कहने से तो लगता है कि वे चाहते तो कह भी सकते थे। लेकिन फिर भी कहते तो वे यही कि मैंने तो किसी को कहा नहीं था सांसदों का वोट खरीदने के लिए। पर उनकी यह नाराजगी तो कुछ भी नहीं थी। इससे ज्यादा नाराजगी तो उन्होंने यह बयान देते हुए दिखायी कि विपक्ष ने शोर तो तब भी मचाया था, पर जनता ने विपक्ष की बातों पर भरोसा ही नहीं किया था। इसीलिए तो उन्हें फिर से जिता दिया और भाजपा तथा वामपंथ की सीटें घटा दीं। वैसे प्रधानमंत्री को कभी चुनाव लड़के भी देख ही लेना चाहिए। उसके बिना जीत-हार के आनंद का पता नहीं चलता है। पर उनका यह बयान आते ही विपक्ष ने पकड़ लिया। वामपंथियों ने कहा-हिटलर भी यही कहता था, मोदी भी यही कहता है। आडवाणीजी ने कहा कि इस तर्क से तो राजीवजी पर लगे आरोप भी सही साबित होते हैं, क्योंकि वे चुनाव हार गए थे। पता नहीं वे ऐसे-ऐसे बयान क्यों देते हैं वे? आरोपों को सही-गलत साबित करने के लिए अदालतें हैं न। पर एक बार फिर यह गुजारिश की जा सकती है कि प्रधानमंत्री एक बार चुनाव लड़कर जरूर देखें। खैर, इस पर असांजे साहब ने कह दिया कि प्रधानमंत्री गलतबयानी कर रहे हैं। इस पर उत्साहित विपक्ष ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे दिया है। खैर, फिर केबल आया कि भाजपा परमाणु करार के वैसे खिलाफ नहीं है जैसी दिखा रही है और यह विरोध तो बस पब्लिक को दिखाने के लिए है। वैसे यह कहा तो खूब जाता है कि पब्लिक बेवकूफ नहीं है, और कि वह सब जानती है। पर फिर भी उसे बेवकूफ बनाने में कसर कोई नहीं छोड़ता। हां, अलबत्ता भाजपा की यह शिकायत जरूर होती होगी कि जनता उसे समझती नहीं है। समस्या यह है कि न वह जनता को समझती है, न जनता उसे समझती है। फिर केबल आया मोदीजी के बारे में। वे फूलकर कुप्पा हो गए कि देखो मेरी कितनी सराहना की है अमेरिका ने। पर कल उसी अमेरिका ने उन्हें वीजा देने से इनकार कर दिया था। खैर, केबल अभी और भी हैं।


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