ऑरलैंडो एक दृष्टिहीन व्यक्ति अपने आई फोन को हाथ में पकड़ नोट पर घुमाता है फोन बता देता है कि नोट दस डॉलर का है। लकवाग्रस्त एक आदमी के हाथ में लगा कंट्रोल मोबाइल के जरिये संचालित होता है। प्रशिक्षित नर्सो की एक पूरी टीम का कॉल सेंटर वायरलेस आधारित चिकित्सा उपकरणों के जरिये दूरदराज के इलाकों में मौजूद मरीजों की पल-पल मॉनीटरिंग कर रहा है। पार्किसन के शिकार मरीज को पेस मेकर की तरह चिप लगाकर दूर से ही नियंत्रित और संतुलित किया जा सकता है और एक स्कैनर युक्त मोबाइल नेत्रहीन व्यक्ति की छड़ी बन सकता है।. सीटीआइए वायरलेस कांफें्रस में आए लोग वायरलेस तकनीक का यह चेहरा देखकर सुखद आश्चर्य महसूस कर रहे हैं। वायरलेस तकनीकें अब वास्तविक वरदान बनने की तरफ बढ़ रही हैं जहां उनका इस्तेमाल केवल संचार और सुविधा के लिए ही नहीं बल्कि पीड़ा, कष्ट, रोग और विकलांगता दूर करने के लिए भी होगा। सीटीआइए वायरलेस कांफ्रेंस में बुधवार को सुबह के सत्र में एम हेल्थ यानी मोबाइल हेल्थ तकनीकों का सत्र विशेषज्ञों के लिए भी अनोखा था। संचार, सूचना व ज्ञान (इंटरनेट) और मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने वाली वायरलेस तकनीक का यह स्वरूप चमत्कारिक और संभावनामय था और कांफ्रेंस हॉल से बाहर कंपनियों के स्टॉल पर ऐसे कई उपकरण भी सजे थे, जो एम हेल्थ की पूरी संकल्पना को सजीव साबित कर रहे थे। एम हेल्थ के नए प्रयोग यह सिद्ध कर रहे हैं कि चिकित्सा में अगली क्रांति वायरलेस के जरिये आएगी। पूरी दुनिया का बाजार अब उन उपकरणों व तकनीकों के साथ तैयार हो चुका है, जिनके इस्तेमाल से डॉक्टर को जांच के लिए मरीज तक आने की जरूरत नहीं होगी और तरह-तरह के वायरलेस सेंसर के जरिये स्थायी विकलांगता से जंग जीती जा सकेगी। मोबाइल हेल्थ की प्रणाली टेलीमेडिसिन से कई पीढ़ी आगे की है। इसमें वायरलेस तकनीक, बायोमीट्रिक सेंसर, क्लाउड कंप्यूटिंग मिलकर चिकित्सा के चमत्कारिक आयाम खोल रहे हैं। अमेरिका के इंस्टी्ट्यूट ऑफ एडवांस हेल्थ सीईओ डॉ. पैट्रिक सून शिआंग ने वीडियो कांफ्रेंसिंग वायरलेस तकनीक के उन वास्तविक प्रयोगों को दिखाया जो कि आने वाले दिनों में चिकित्सा का चेहरा बदलने वाले हैं। शिआंग ने कहा कि एक ऐसे कॉल सेंटर का परीक्षण शुरू हो चुका है जो 40 हजार मरीजों को वायरलेस उपकरणों के जरिये मॉनीटर करेगा और प्रशिक्षित डॉक्टरों का पूरा तंत्र मरीजों से दुतरफा संवाद करते हुए उनका इलाज करेगा। दृष्टि विकलांगों को नोट पहचानने में मदद करने वाला एप्लीकेशन मनी रीडर तो पहले से तैयार है, मगर डॉ. शिआंग ने वह प्रयोग भी दिखाया जिसमें एक दृष्टिहीन व्यक्ति के रेटिना की जगह एक सेंसर लगाया जाता है और वह सेंसर आंख का काम करते हुए मस्तिष्क से संदेश देता रहता है। वायरलेस तकनीकों की दुनिया बायोमीट्रिक सेंसर और मस्तिष्क के न्यूरॉन तंत्र को जोड़कर बड़े चमत्कारिक काम कर रही है। डॉ. शिआंग का कहना था शरीर में सेंसरों का प्रत्यारोपण और वायरलेस तकनीक के जरिये मरीजों की मॉनीटरिंग शुरू होने में अब ज्यादा वक्त नहीं है। डॉ. शिआंग ठीक कहते हैं, इरिक्सन के स्टाल पर मौजूद गुरकीरत सिद्धू वह तकनीक दिखा रहे हैं, जिसमें मरीज के बिस्तर के सामने एक वेब कैमरा व टच पैड लगा है और मरीज की उंगली में एक वायरलेस आक्जियोमीटर है। हाई रिजोल्यूशन कैमरा मरीज के शरीर की निकटतम तस्वीरें ले सकता है। यह पूरा तंत्र मिलकर डॉक्टर को पल-पल की जानकारी दे रहा है। पूरा आंकड़ा अस्पताल के सर्वर में स्टोर हो रहा है और डॉक्टर इसी तंत्र के जरिये मरीज को निर्देश दे रहे हैं। अमेरिका के अस्पतालों में यह तकनीक इस्तेमाल हो रही है। इसके भारत पहुंचने में भी ज्यादा देर नहीं है। केवल इरिक्सन ही क्यों वायरलेस हेल्थ गैजेट्स का पूरा बाजार ही उभर रहा है जैसे कि कलाई या गले में (पेंडेंट) पहनी जाने वाली वेसाग वाच जो शरीर के हर जरूरी तंत्र (बीपी, बुखार, पल्स, ग्लूकोज आदि) को जांचने वाला वायरलेस हब है। यह पूर्व निर्धारित नंबरों पर डॉक्टर को सीधे संदेश भेजने की क्षमता से लैस है या फिर ब्लूटूथ आधारित स्टेथोस्कोप जो कि धड़कन व पल्स को रिकॉर्ड कर दूर बैठे डॉक्टरों को सुना सकता है। या ग्लूकोज गार्जियन जो पेजर के तरीके से बेल्ट से बंधा रहता है और शरीर से लगे इसके सेंसर हर पल ग्लूकोज का स्तर नापते व अपेक्षित डॉक्टरों को भेजते रहते हैं। यानी कि सुई चुभाकर शर्करा नापने की जहमत नहीं। चिकित्सा से जुड़कर वायरलेस तकनीकों की दुनिया को अब उस क्षितिज की तरफ देखने लगी है जहां उसे एक विशिष्ट भूमिका मिल जाती है। किसी तकनीक की उपयोगिता का यही तो चरम बिंदु है। मोबाइल चिकित्सा अब बहुत दूर नहीं है|
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