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Sunday, March 13, 2011

क्रांति के नए औजार


कुछ वर्ष पहले जब एप्पल कंप्यूटर्स ने महात्मा गांधी की एक तसवीर का अपने सॉफ्टवेयर के विज्ञापन के लिए उपयोग किया था, तो उस घटना ने हमें कुछ अलग सोचने पर मजबूर किया था। तब मैं भी उन कुछ भारतीयों में से था, जो इससे बेचैन और दुखी हुआ था। यहां आदर्श पर व्यावसायिक हित को तरजीह दी गई थी।
हाल में टूनीशिया से लेकर मिस्र तक की घटनाओं में दो विपरीत दिशाओं में चलने वाली कॉरपोरेट प्रौद्योगिकी और उग्र सुधारवादी राजनीतिक परिकल्पना को एक साथ देखा गया। मध्य पूर्व में इंटरनेट और उसके अनुषंग माध्यमों ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ गलियों और चौराहों पर लोगों को उतारने और अभूतपूर्व अहिंसक आंदोलनों के जरिये तानाशाही शासन को पलटने में सक्षम बनाया है। इसी तरह काहिरा और अलेक्जेंड्रिया में फेसबुक व ट्विटर के कुछ युवा संचालक प्रकारांतर से गांधीवादी विचारधारा के समर्थक के तौर पर ही नजर आए।
मिस्र में आंदोलनकारियों को अहिंसक तौर-तरीके अपनाने के निर्देश देने वाला जीन शार्प नाम का अमेरिकी गुरु था। महात्मा गांधी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विद्वान शार्प ने मिस्रवासियों को बताया कि कैसे निहत्थे नागरिक दमनकारी तानाशाह को हरा सकते हैं। कतर स्थित प्रवासी युवा मिस्रियों के एक दल ने परिवर्तन अकादमी (एकेडमी ऑफ चेंज) का गठन किया है, जो कि अपने नाम की तुलना में काम के कारण ही ज्यादा जाना जाता है। और इस अकादमी से जुड़े युवा वेबसाइट पर शार्प के गंभीर पाठक भी हैं। 83 वर्षीय जीन शार्प ट्विटर पर एक जाना-माना नाम हैं। नौ सौ पृष्ठों की पॉलिटिक्स ऑफ नॉन वायोलेंट ऐक्शन नाम की किताब के लेखक के तौर पर वह चर्चित हैं।
शार्प ने अहिंसक आंदोलनकारियों की एक समृद्ध परंपरा विकसित की है-ये आंदोलनकर्मी पुलिस और सरकारी अधिकारियों के सामने किसी के कपड़े भी उतार सकते हैं, किसी को सरकारी भवनों की रेलिंग से बांध सकते हैं और गलियों में व्यंग्यात्मक नुक्कड़ नाटक भी कर सकते हैं। शार्प ने गांधीवाद के एक मुख्य सूत्र को अच्छी तरह सीख लिया है : तानाशाही सत्ता तब लड़खड़ा सकती है, जब शोषित जनता उसकी हरकतों के लिए उसे शर्मिंदा और बेचैन करने में सक्षम हो। जब ऐसा होता है, तब जनता में तानाशाही का रौब भी खत्म हो जाता है।
जैसा कि मैंने तहरीर से आने वाली खबरों में सुना, काहिरा के मुख्य चौराहे पर त्योहार का मौसम था। वहां डेरा डाले परिवार और अनजाने लोग खाते, गाते, बात करते हुए विरोध कर रहे थे। यह घटना मुझे अगस्त, 1980 की याद दिला रही थी, जब मैं गैडांस्क में लेनिन शिपयार्ड से गुजर रहा था, जिसमें लेक वेलेसा ने पॉलिश जनरलों के साथ निर्णायक टकराव का नेतृत्व किया था। हालांकि मिस्र और दूसरी जगह हुए आंदोलनोंके संदर्भ में फेसबुक पर जो कुछ भी दिख रहा है, उसमें अपने अधिकारों की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों की तुलना में अभी राजनीतिक शक्ति की कोई प्रभावकारी छवि नहीं दिखती।
यहां यह रेखांकित करना गलत नहीं होगा कि गांधी स्वयं जनसंचार की नई प्रौद्योगिकी, खासकर सिनेमाई छवियों को अपनाने वालों में से थे। वर्ष1930 के दांडी मार्च के निपुण चित्रांकण ने शीघ्र ही नमक सत्याग्रह को विश्व-प्रसिद्ध घटना बना दिया था। दरअसल दांडी के लिए प्रस्थान करने से पहले बापू ने तीन फिल्म कर्मचारियों और कुछ फोटोग्राफरों को चुनकर अपने साथ कर लिया था। मोटरकार में गांधी के पीछे-पीछे चलकर उन्होंने उस पूरे अभियान की तसवीरें खींचीं, जो दुनिया भर में दिखाई गईं। धूल-धूसरित मैदान में लंबे डग भरते हुए अपने अनुयायियों का नेतृत्व करते महात्मा गांधी की छवि तब लाखों लोगों के मानस में कौंध गई थी।
अगर गांधी छवियों और सूचनाओं का मनमाफिक इस्तेमाल करने में कुशल थे, तो शानदार मौकों पर लोगों को इकट्ठा करने में भी माहिर थे। उसी तरह वे आयोजनों के कुशल शिल्पी भी थे। उन्होंने सालाना चाय पार्टी करने वाली कांग्रेस को एक चिरस्थायी आंदोलन में तबदील कर दिया।
राजनीतिक आंदोलन के संदर्भ में इन नई प्रौद्योगिकियों की सीमाओं को पहचानना भी महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद इसकी ताकत को खारिज नहीं किया जा सकता। इंटरनेट सूचनाएं फैलाने का इतना प्रभावशाली माध्यम है कि यह तेजी से दमनकारी सत्ता का क्षय कर सकता है। लिहाजा हमें इसकी पहुंच का विस्तार करने की जरूरत है।
इसकी इसी विशेषता के कारण कई सरकारें इसके खिलाफ जाना पसंद करती हैं। मिस्र में प्रदर्शन के दौरान मुबारक ने इंटरनेट सेवा बंद करने की कोशिश की थी, अन्य अरब देशों में भी ऐसी कोशिश हुई। चीन में फेसबुक पर किसी तरह प्रतिबंध लगाया गया है। यहां तक कि अमेरिका में भी इंटरनेट के राजनीतिक उपयोग को लेकर दोहरा रवैया है। जो अमेरिका इंटरनेट की आजादी की वकालत करता है और तानाशाही सत्ताओं द्वारा इंटरनेट सेवा को बाधित करने से रोकने का दुनिया भर में अभियान चलाता है, उसी अमेरिका ने पिछले दिनों विकिलीक्स पर हमला बोला और उसे वेबसाइट बंद करने को कहा!
भारत की बात करें, तो यहां सरकार इंटरनेट सेवा को बाधित करने के लिए परेशान नहीं है, हां, बिजली की कमी इंटरनेट तक पहुंच को निश्चित रूप से बाधित करती है। वैसे भी इंटरनेट तक पहुंच सात करोड़ से कम ही लोगों की है, जो कि पूरी आबादी का छोटा सा हिस्सा है। भारत में आर्थिक गरीबी ज्यादातर लोगों को साइबर दुनिया से दूर रखती है।
क्या विडंबना है! गरीबी ही क्रांतियों का स्रोत रही है। लेकिन अब गरीबों और तकनीकी औजारों के जरिये क्रांति में मदद करने वाले के बीच गरीबी ही फासला पैदा कर रही है|

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