प्रधानमंत्री एवं अन्य अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों के लिए विशेष बोइंग विमान के सौदे में अमेरिका ने अंतिम समय में शर्त बदलकर भारत सरकार को मुश्किल में डाल दिया था। बिना किसी बातचीत के हुई इस एकतरफा कार्रवाई ने इस सौदे पर सवाल खड़ा कर दिया था। आखिरकार सौदे के दस्तावेज में शब्दों के हेरफेर के बाद केंद्र सरकार मान गई, लेकिन अमेरिका से अनुरोध किया था कि इस बात को जगजाहिर न करे। लगातार गोपनीय दस्तावेज जारी कर पूरी दुनिया में तहलका मचाने वाली वेबसाइट विकिलीक्स के ताजा रहस्योद्घाटन में यह बात जाहिर हुई है। दिल्ली में अमेरिकी दूतावास की ओर से 5 मई, 2008 को वाशिंगटन भेजे गए केबल में कहा गया था कि भारतीय वार्ताकारों ने बोइंग विमानों के लिए प्रारंभिक सौदा होने के बाद सालाना निरीक्षण की शर्त जोड़े जाने का कड़े शब्दों में विरोध किया है। विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव गायत्री कुमार ने अमेरिका के सहायक रक्षा उप मंत्री जेम्स क्लैड के साथ बातचीत में स्पष्ट कर दिया है कि विमान के सुरक्षा सूइट के सालाना निरीक्षण की शर्त जोड़े जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया होगी। अगर कोई तकनीकी या वित्तीय मसला होता तो कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन प्रधानमंत्री के लिए तैयार किए जा रहे विमान के विशेष सूइट के अमेरिकी अधिकारियों द्वारा निरीक्षण की बात राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। हालांकि बाद में भारत सरकार बदली हुई शर्तो के साथ इस सौदे के लिए तैयार हो गई, लेकिन उस समय यह किसी को पता नहीं चल पाया था कि टूट रहा सौदा कैसे पटरी पर आ गया। विकिलीक्स के अनुसार 29 मई, 2008 को भेजे गए केबल में बताया गया है कि तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के नारायणन के कहने पर सौदे में विमान के ऑन साइट इंस्पेक्शन की जगह ऑन साइट रिव्यू की बात जोड़ दी गई। इसके बावजूद सरकार इस बात से आशंकित थी कि अमेरिकी दबाव में शर्त बदलने की बात कहीं सार्वजनिक न हो जाए। इसलिए सौदे पर हस्ताक्षर करने के साथ ही अमेरिका को यह बता दिया गया था कि इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक बहस न होने पाए।
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