Tuesday, March 29, 2011
Monday, March 28, 2011
विकीलीक्स खुलासों के बाद भारत की छवि
विदेश नीति के ठोस मुद्दों पर भारत एक उभरते हुए आर्थिक, सैनिक और 'राजनीतिक दैत्य' के रूप में सामने आने पर भी इस मामले में अब भी अस्थिर, डावांडोल और संकोची है कि दुनिया में इसको कौन सी भूमिका अदा करनी चाहिए। स्वयं को शांतिपूर्वक व आत्मविश्वास के साथ पेश करने के स्थान पर-खास तौर पर उन मामलों में जिनमें अमेरिका के सम्बंधों को लेकर समझ में भिन्नताएं हैं और जिनमें भारत के महत्वपूर्ण हित दांव पर होते हैं- नई दिल्ली प्राय: वाशिंगटन के दबाव में, और कभी-कभी तो प्रतिरोध के बगैर ही, झुक जाती है
भारत सम्बंधी विकीलीक्स केबल्स के एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार में प्रकाशित सार- संक्षेप ने तूफान बरपा कर दिया है। इनमें सबसे सनसनीखेज खुलासा 2008 की जुलाई के 'वोट दो-नकद लो' की बदनामी को लेकर है। उस समय भारत-अमेरिकी न्यूिक्लयर सहयोग समझौते को लेकर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के अस्तित्व को दांव पर लगा दिया था। उनकी अल्पमत सरकार जिन वामपंथियों के समर्थन पर चल रही थी, उन्होंने समर्थन वापस ले लिया था। उद्घाटित तथ्यों के अनुसार सरकार बचाने के लिए कांग्रेस ने अन्य पार्टियों को घूस देकर पक्ष में कर लिया। 2008 में अपने स्ंिटग आपरेशनों से टीवी चैनलों ने इसका व्यापक स्तर पर प्रचार किया था। तब इन खुलासों में मुख्य निशाना समाजवादी पार्टी को बनाया गया। अब पता चल रहा है कि राष्ट्रीय लोक दल के अजीत सिंह को भी घूस दी गई थी और यह काम कैप्टन सतीश शर्मा के एक सहायक नचिकेता कपूर के जरिये हुआ था। नचिकेता ने अमेरिकी दूतावास के एक अधिकारी को वे दो पेटियां दिखाई थीं जिनमें रालोद के सांसदों को दिए गए 50-60 करोड़ रुपयों का एक हिस्सा था। डॉ. सिंह ने अपनी सरकार का जोरदार और जुझारू बचाव करते हुए कहा कि भारत में अमेरिकी दूतावास द्वारा भेजे गए केबलों की सच्चाई, विषय-वस्तु और उनके अस्तित्व तक की पुष्टि नहीं की जा सकती है। उन्होंने दो टूक शब्दों में कहा, ''मैंने किसी को भी कोई वोट खरीदने का अधिकार नहीं दिया। मुझे वोटों की खरीद के बारे में..क़ोई जानकारी नहीं है..।'' इस कहानी को सतीश शर्मा ने भी मानने से इनकार किया और कहा कि कपूर उनका सहायक नहीं था। हालांकि इससे दाग साफ नहीं होता। विकीलीक्स पर आधारित साक्ष्य पहली दृष्टि में यह मामला तैयार करते हैं कि कि सांसद खरीदे गए थे। इसने यह पक्का कर दिया था कि 256 'ना' वोटों के खिलाफ 275 'हां' वोटों के साथ संप्रग सरकार जीत जाएगी। भारत की धरती पर 'वोट दो-नकद लो' एक गम्भीर अपराध हुआ है। इसके सहभागी विदेशी राजनयिक थे। अब सरकार कम से कम इतना तो कर ही सकती है कि पूरे मामले की जांच सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में केंद्रीय जांच ब्यूरो को सौंप दे, और अमेरिकी दूतावास से उस कर्मचारी की पहचान करने को कहे जिसने इस करतूत को अपने केबलों के जरिये भेजा था। ऐसा न करने पर केंद्र सरकार की छवि पर और बट्टा लगेगा जो पहले से ही बहुत से घोटालों में बदनाम हुई बैठी है। इस खुलासे से भारतीय जनता पार्टी अधिकतम फायदा उठाने में जी जान से लगी है। पर टेपों से इसका चेहरा और भी गंदा होकर उभरता है। सार्वजनिक रूप से इसने न्यूिक्लयर समझौते का विरोध किया था। लेकिन विरोध को लेकर यह गम्भीर नहीं थी। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य शेषाद्रिचारी और प्रवक्ता प्रकाश जावडेकर ने अमेरिकियों से कहा था- विदेश नीति प्रस्तावों पर अधिक ध्यान न दें। जबकि स्वयं लौहपुरुष लालकृष्ण आडवाणी ने उनको आश्वस्त किया था कि सत्ता में आने पर भाजपा, अपने विरोध पक्ष के दिनों से बहुत अलग व्यवहार करेगी। भाजपा अक्सर ही शिकारी कुत्तों के साथ शिकार करती है और दौड़ती खरगोश के साथ है। इसलिए इसकी न्यूिक्लयर नीति को निर्धारित करने के भारत के अधिकार के मामले में इसको भारत- अमेरिकी समझौते का विरोध करना फायदेमंद लगा था परंतु सैद्धांतिक तौर पर पार्टी दक्षिणपंथी विदेश अैार सुरक्षा नीति पर चलती है, और शीतयुद्ध के दिनों से ही यह घोर अमेरिका समर्थक रही है। इसको भारत का भविष्य अमेरिकी आधिपत्य वाली पूंजीवादी विश्व व्यवस्था को मज़बूत बनाने में नज़र आता है। इससे भाजपा के व्यवहार में दोहरापन आ जाता है और इसकी विश्वसनीयता को भारी नुकसान पहुंचता है। परंतु विकीलीक्स के खुलासों का उतना महत्व भ्रष्टाचार और राजनीतिक अपराधों की पुष्टि के लिए नहीं है जितना कि उस दिशा को दिखाने के लिए जिसमें भारत की विदेश नीति हाल ही में चलने लग पड़ी है, और यह भी कि दुनिया, खासतौर पर अमेरिका की नज़र में भारत की घरेलू स्थिति और क्षेत्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय घटनाओं के प्रति दृष्टिकोण क्या है। इन खुलासों में आमतौर पर तरह-तरह के मामलों पर उपयोगी और कभी-कभी बहुमूल्य जानकारी होती है जैसे कि देश की पार्टियों के आपसी और उनके भीतरी सम्बंध, कश्मीर, न्यूक्लियर सौदा, आम लोगों की समझ, भारत-पाक तनाव, ईरान की न्यूक्लियर दौड़ तथा तेहरान को घेरने की अपनी योजना में भारत का समर्थन लेने के लिए भारत को धमकाने की अमेरिकी कोशिशें, और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों की भारत की मांग को महज़ शोरगुल कहना। राजनयिकों द्वारा केबलों का इस्तेमाल संचार के एक रूप के तौर पर मेज़वान देश की सूचनाओं, विश्लेषणों और आकलनों को अपनी सरकारों तक पहुंचाने के लिए किया जाता है, और वे संप्रग के आपसी मतभेदों को काफी हद तक सामने लाते हैं। अफज़ल गुरु की फांसी की सज़ा को लेकर तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम और कांगेस अध्यक्ष के बीच के मतभेद को सुखियरे में लाते हैं। इनमें जे.के.एल.एफ. के नेता यासीन मलिक को यह कहते उद्धृत किया गया है कि गुरु को फांसी देने से घाटी में प्रतिकूल असर पड़ेगा क्योंकि सज़ा संसद पर हमले के लिए यातायात का प्रबंध करने में मदद देने के आरोप से किसी भी तरह से मेल नही खाती है। अखबार के ये खुलासे डॉ. सिंह और पूर्व राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के. नारायणन के बीच के मतभेदों पर रोशनी डालते हैं जो पाकिस्तान के साथ साझा नियति के आधार पर बातचीत दोबारा शुरू करने को लेकर थे। नारायणन ने प्रधानमंत्री से रुखाई के साथ बोल दिया था- 'आपकी नियति साझा होगी, हमारी नहीं है।'
नारायणन के लिए अपने प्रधानमंत्री से ऐसा बोलना बेहद अनुचित था। लेकिन इससे भी ज्यादा निंदनीय तो यह बात अमेरिकी राजनयिक को बताना थी। विदेश नीति के ठोस मुद्दों पर भारत एक उभरते हुए आर्थिक, सैनिक और 'राजनीतिक दैत्य' के रूप में सामने आने पर भी इस मामले में अब भी अस्थिर, डावांडोल और संकोची है कि दुनिया में इसको कौन सी भूमिका अदा करनी चाहिए। अपने आपको शांतिपूर्वक और आत्मविश्वास के साथ पेश करने के स्थान पर- खास तौर पर उन मामलों में जिनमें अमेरिका के सम्बंधों को लेकर समझ में भिन्नताएं हैं और जिनमें भारत के महत्वपूर्ण हित दांव पर होते हैं- नई दिल्ली प्राय: वाशिंगटन के दबाव में, और कभी-कभी तो प्रतिरोध के बगैर ही, झुक जाती है। ईरान के मामले में यह खासतौर पर नज़र आता है जिसमें भारत अमेरिकी दबाव में है। अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में भारत ईरान के खिलाफ तीन बार वीटो का इस्तेमाल कर चुका है, जिससे सुरक्षा परिषद को इसके विरुद्ध प्रतिबंध लगाने की इजाज़त मिल गई है। ईरान के विरुद्ध वोट भारत की अपनी बेहतर सोच, और विदेश मंत्रालय के इस निष्कर्ष के भी खिलाफ थे कि अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी अथवा अप्रसार संधि के अंर्तगत ईरान ने अपने दायित्वों का कोई ठोस उल्लंघन नहीं किया है।
Sunday, March 27, 2011
अब विकिलीक्स के फंदे में फंसे अरुण जेटली
कांग्रेस के बाद अब विकिलीक्स के खुलासे भाजपा नेताओं के लिए भी परेशानी का सबब बनने लगे हैं। राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली के बारे में विकिलीक्स के ताजा रहस्योद्घाटन से पार्टी की मुसीबतें बढ़ी हैं। नए केबल में जेटली के एक बयान का हवाला दिया गया है, जिसमें उन्होंने हिंदू राष्ट्रवाद को अपनी पार्टी के लिए महज अवसरवादी मुद्दा बताया है। हालांकि जेटली ने अमेरिकी राजनयिक राबर्ट ब्लेक से बातचीत को स्वीकार करने के बावजूद शनिवार को कहा कि उन्होंने अवसरवादी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया था। वर्ष 2005 में अमेरिकी दूतावास के राजनयिक राबर्ट ब्लेक से बातचीत को स्वीकार करते हुए भाजपा नेता जेटली ने कहा कि उन्होंने सीमा पार से होने वाले आतंकवाद, बांग्लादेश से अवैध घुसपैठ और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को अमेरिका के वीजा न दिए जाने जैसे मसलों पर अपना विचार रखा था, लेकिन राष्ट्रवाद या हिंदू राष्ट्रवाद के संदर्भ में अवसरवाद शब्द का उल्लेख न तो मेरा विचार है और न ही मेरी भाषा। यह अमेरिकी राजनयिक की ओर से स्वत: प्रयोग किया गया शब्द है। विकिलीक्स के इस ताजा केबल पर भला कांग्रेस कहां चूकने वाली थी। कांग्रेस के प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा सारा भांडा फूट रहा है। भाजपा खुद के तरकश के तीरों से ही लहूलुहान हो रही है। इसीलिए कहते हैं कि जो लोग शीशे के मकान में रहते हैं, उन्हें दूसरों के घरों पर पत्थर नहीं फेंकने चाहिए। अमेरिकी राजनयिक ने जो संदेश वाशिंगटन भेजा था, उसमें कहा गया है कि हिंदुत्व के सवाल पर बातचीत के दौरान जेटली ने तर्क दिया कि हिन्दू राष्ट्रवाद भाजपा के लिए हमेशा चर्चा का बिंदु रहेगा। उन्होंने हालांकि, इसे एक अवसरवादी मुद्दा बताया। भेजे गये संदेश के मुताबिक भारत-पाक रिश्तों में हाल में आए सुधार के मद्देनजर उन्होंने (जेटली) कहा कि हिंदू राष्ट्रवाद अब कम असरदार हो गया है। लेकिन सीमा पार से एक और आतंकी हमला होने पर हालात फिर पलट सकते हैं। विकिलीक्स केबल के अनुसार जेटली ने मोदी को अमेरिकी वीजा नहीं दिए जाने को अनुचित बताया और कहा कि उनकी पार्टी के लोग इसे अपने नेता पर व्यक्तिगत प्रहार के रूप में ले रहे हैं। जेटली हालांकि, ब्लेक की इस बात से सहमत हुए कि मोदी ध्रुवीकरण व्यक्तित्व वाले हैं।
Saturday, March 26, 2011
वायरलेस आधारित चिकित्सा
ऑरलैंडो एक दृष्टिहीन व्यक्ति अपने आई फोन को हाथ में पकड़ नोट पर घुमाता है फोन बता देता है कि नोट दस डॉलर का है। लकवाग्रस्त एक आदमी के हाथ में लगा कंट्रोल मोबाइल के जरिये संचालित होता है। प्रशिक्षित नर्सो की एक पूरी टीम का कॉल सेंटर वायरलेस आधारित चिकित्सा उपकरणों के जरिये दूरदराज के इलाकों में मौजूद मरीजों की पल-पल मॉनीटरिंग कर रहा है। पार्किसन के शिकार मरीज को पेस मेकर की तरह चिप लगाकर दूर से ही नियंत्रित और संतुलित किया जा सकता है और एक स्कैनर युक्त मोबाइल नेत्रहीन व्यक्ति की छड़ी बन सकता है।. सीटीआइए वायरलेस कांफें्रस में आए लोग वायरलेस तकनीक का यह चेहरा देखकर सुखद आश्चर्य महसूस कर रहे हैं। वायरलेस तकनीकें अब वास्तविक वरदान बनने की तरफ बढ़ रही हैं जहां उनका इस्तेमाल केवल संचार और सुविधा के लिए ही नहीं बल्कि पीड़ा, कष्ट, रोग और विकलांगता दूर करने के लिए भी होगा। सीटीआइए वायरलेस कांफ्रेंस में बुधवार को सुबह के सत्र में एम हेल्थ यानी मोबाइल हेल्थ तकनीकों का सत्र विशेषज्ञों के लिए भी अनोखा था। संचार, सूचना व ज्ञान (इंटरनेट) और मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने वाली वायरलेस तकनीक का यह स्वरूप चमत्कारिक और संभावनामय था और कांफ्रेंस हॉल से बाहर कंपनियों के स्टॉल पर ऐसे कई उपकरण भी सजे थे, जो एम हेल्थ की पूरी संकल्पना को सजीव साबित कर रहे थे। एम हेल्थ के नए प्रयोग यह सिद्ध कर रहे हैं कि चिकित्सा में अगली क्रांति वायरलेस के जरिये आएगी। पूरी दुनिया का बाजार अब उन उपकरणों व तकनीकों के साथ तैयार हो चुका है, जिनके इस्तेमाल से डॉक्टर को जांच के लिए मरीज तक आने की जरूरत नहीं होगी और तरह-तरह के वायरलेस सेंसर के जरिये स्थायी विकलांगता से जंग जीती जा सकेगी। मोबाइल हेल्थ की प्रणाली टेलीमेडिसिन से कई पीढ़ी आगे की है। इसमें वायरलेस तकनीक, बायोमीट्रिक सेंसर, क्लाउड कंप्यूटिंग मिलकर चिकित्सा के चमत्कारिक आयाम खोल रहे हैं। अमेरिका के इंस्टी्ट्यूट ऑफ एडवांस हेल्थ सीईओ डॉ. पैट्रिक सून शिआंग ने वीडियो कांफ्रेंसिंग वायरलेस तकनीक के उन वास्तविक प्रयोगों को दिखाया जो कि आने वाले दिनों में चिकित्सा का चेहरा बदलने वाले हैं। शिआंग ने कहा कि एक ऐसे कॉल सेंटर का परीक्षण शुरू हो चुका है जो 40 हजार मरीजों को वायरलेस उपकरणों के जरिये मॉनीटर करेगा और प्रशिक्षित डॉक्टरों का पूरा तंत्र मरीजों से दुतरफा संवाद करते हुए उनका इलाज करेगा। दृष्टि विकलांगों को नोट पहचानने में मदद करने वाला एप्लीकेशन मनी रीडर तो पहले से तैयार है, मगर डॉ. शिआंग ने वह प्रयोग भी दिखाया जिसमें एक दृष्टिहीन व्यक्ति के रेटिना की जगह एक सेंसर लगाया जाता है और वह सेंसर आंख का काम करते हुए मस्तिष्क से संदेश देता रहता है। वायरलेस तकनीकों की दुनिया बायोमीट्रिक सेंसर और मस्तिष्क के न्यूरॉन तंत्र को जोड़कर बड़े चमत्कारिक काम कर रही है। डॉ. शिआंग का कहना था शरीर में सेंसरों का प्रत्यारोपण और वायरलेस तकनीक के जरिये मरीजों की मॉनीटरिंग शुरू होने में अब ज्यादा वक्त नहीं है। डॉ. शिआंग ठीक कहते हैं, इरिक्सन के स्टाल पर मौजूद गुरकीरत सिद्धू वह तकनीक दिखा रहे हैं, जिसमें मरीज के बिस्तर के सामने एक वेब कैमरा व टच पैड लगा है और मरीज की उंगली में एक वायरलेस आक्जियोमीटर है। हाई रिजोल्यूशन कैमरा मरीज के शरीर की निकटतम तस्वीरें ले सकता है। यह पूरा तंत्र मिलकर डॉक्टर को पल-पल की जानकारी दे रहा है। पूरा आंकड़ा अस्पताल के सर्वर में स्टोर हो रहा है और डॉक्टर इसी तंत्र के जरिये मरीज को निर्देश दे रहे हैं। अमेरिका के अस्पतालों में यह तकनीक इस्तेमाल हो रही है। इसके भारत पहुंचने में भी ज्यादा देर नहीं है। केवल इरिक्सन ही क्यों वायरलेस हेल्थ गैजेट्स का पूरा बाजार ही उभर रहा है जैसे कि कलाई या गले में (पेंडेंट) पहनी जाने वाली वेसाग वाच जो शरीर के हर जरूरी तंत्र (बीपी, बुखार, पल्स, ग्लूकोज आदि) को जांचने वाला वायरलेस हब है। यह पूर्व निर्धारित नंबरों पर डॉक्टर को सीधे संदेश भेजने की क्षमता से लैस है या फिर ब्लूटूथ आधारित स्टेथोस्कोप जो कि धड़कन व पल्स को रिकॉर्ड कर दूर बैठे डॉक्टरों को सुना सकता है। या ग्लूकोज गार्जियन जो पेजर के तरीके से बेल्ट से बंधा रहता है और शरीर से लगे इसके सेंसर हर पल ग्लूकोज का स्तर नापते व अपेक्षित डॉक्टरों को भेजते रहते हैं। यानी कि सुई चुभाकर शर्करा नापने की जहमत नहीं। चिकित्सा से जुड़कर वायरलेस तकनीकों की दुनिया को अब उस क्षितिज की तरफ देखने लगी है जहां उसे एक विशिष्ट भूमिका मिल जाती है। किसी तकनीक की उपयोगिता का यही तो चरम बिंदु है। मोबाइल चिकित्सा अब बहुत दूर नहीं है|
Friday, March 25, 2011
बोइंग सौदे में भी अमेरिकी दखल
प्रधानमंत्री एवं अन्य अति महत्वपूर्ण व्यक्तियों के लिए विशेष बोइंग विमान के सौदे में अमेरिका ने अंतिम समय में शर्त बदलकर भारत सरकार को मुश्किल में डाल दिया था। बिना किसी बातचीत के हुई इस एकतरफा कार्रवाई ने इस सौदे पर सवाल खड़ा कर दिया था। आखिरकार सौदे के दस्तावेज में शब्दों के हेरफेर के बाद केंद्र सरकार मान गई, लेकिन अमेरिका से अनुरोध किया था कि इस बात को जगजाहिर न करे। लगातार गोपनीय दस्तावेज जारी कर पूरी दुनिया में तहलका मचाने वाली वेबसाइट विकिलीक्स के ताजा रहस्योद्घाटन में यह बात जाहिर हुई है। दिल्ली में अमेरिकी दूतावास की ओर से 5 मई, 2008 को वाशिंगटन भेजे गए केबल में कहा गया था कि भारतीय वार्ताकारों ने बोइंग विमानों के लिए प्रारंभिक सौदा होने के बाद सालाना निरीक्षण की शर्त जोड़े जाने का कड़े शब्दों में विरोध किया है। विदेश मंत्रालय के संयुक्त सचिव गायत्री कुमार ने अमेरिका के सहायक रक्षा उप मंत्री जेम्स क्लैड के साथ बातचीत में स्पष्ट कर दिया है कि विमान के सुरक्षा सूइट के सालाना निरीक्षण की शर्त जोड़े जाने पर कड़ी प्रतिक्रिया होगी। अगर कोई तकनीकी या वित्तीय मसला होता तो कोई दिक्कत नहीं होती, लेकिन प्रधानमंत्री के लिए तैयार किए जा रहे विमान के विशेष सूइट के अमेरिकी अधिकारियों द्वारा निरीक्षण की बात राजनीतिक रूप से संवेदनशील है। हालांकि बाद में भारत सरकार बदली हुई शर्तो के साथ इस सौदे के लिए तैयार हो गई, लेकिन उस समय यह किसी को पता नहीं चल पाया था कि टूट रहा सौदा कैसे पटरी पर आ गया। विकिलीक्स के अनुसार 29 मई, 2008 को भेजे गए केबल में बताया गया है कि तत्कालीन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एम.के नारायणन के कहने पर सौदे में विमान के ऑन साइट इंस्पेक्शन की जगह ऑन साइट रिव्यू की बात जोड़ दी गई। इसके बावजूद सरकार इस बात से आशंकित थी कि अमेरिकी दबाव में शर्त बदलने की बात कहीं सार्वजनिक न हो जाए। इसलिए सौदे पर हस्ताक्षर करने के साथ ही अमेरिका को यह बता दिया गया था कि इस मुद्दे पर कोई सार्वजनिक बहस न होने पाए।
Thursday, March 24, 2011
एक मोबाइल पांच लाख इस्तेमाल
ऑरलैंडो पिता जी चाचा जी से मिलने निकले थे अब कहां होंगे। बेटा अब तक कॉलेज से नहीं लौटा। बेटी तो सहेली के यहां से तो चल चुकी है। ..सबको अलग-अलग फोन करने की जहमत मत उठाइए। बस, आपके और आपके परिवार के सदस्यों के फोन एक नए तरह के फीचर (एप्लीकेशन) से लैस होने चाहिए और आप किसी को कॉल किए बगैर सेटेलाइट मैप के जरिए जान जाएंगे वह शहर में कहां है और सुरक्षित है। 8 जॉगिंग करते समय मोबाइल आपको पिछली कसरत का आंकड़ा बताए और सेहत की जानकारी देता जाए तो कैसा रहेगा। 8 सड़क पर कोई हादसा देखकर फोटो या वीडियो लेकर भेजने या किसी मुश्किल में होने पर एक बटन दबाकर अलर्ट भेजने की सुविधा मिल जाए, तो बड़ी राहत होगी। 8ताजमहल को देखते वक्त अगर आपका फोन गाइड बन जाए या खरीदारी से पहले फोन आपको अलग-अलग दुकानों पर उस उत्पाद की कीमत और उपभोक्ताओं की प्रतिक्रिया बताए तो फिर क्या कहना। मोबाइल फोन की नई दुनिया में यह सब कुछ संभव है। मोबाइल की नई पाठशाला में अब ए से एप्पल नहीं बल्कि एप्लीकेशन पढ़ाया जा रहा है। आइ फोन, आइ पैड, सैमसंग गैलेक्सी, ब्लैकबेरी प्लेबुक, एचटीसी जैसे स्मार्ट फोन और टैबलेट कंप्यूटर से सजी दूरसंचार की नई दुनिया मोबाइल के इस्तेमाल की हर कल्पना को सच करने में जुटी है। ऑरलैंडो के इस ऑरेंज काउंटी कन्वेन्शन सेंटर में सीटीआइए वायरलेस शो में मोबाइल एप्लीकेशन का शानदार नजारा है। यहां हर कोई मोबाइल के नए प्रयोगों यानी एप्लीकेशन (आमतौर पर ऐप्स) के दबदबे को दांतो तले अंगुली दबाकर देख रहा है। ताजा सूचना तक मोबाइल फोन के पांच लाख विभिन्न एप्लीकेशन इंटरनेट पर खुले एप्लीकेशन बाजारों में सज चुके हैं और डाउनलोड किए जा रहे हैं। यानी एक मोबाइल के पांच लाख इस्तेमाल। तकनीक और संचार की दुनिया के सूरमा कहते हैं कि अब धंधा फोन बेचने का नहीं, बल्कि एप्लीकेशन बेचने का है। बात भी सही है, क्योंकि अब फोन खरीदने वाला यह पूछता है कि यह फोन फलां ऐप यानी इस्तेमाल को सपोर्ट करेगा या नहीं। कहना मुश्किल है कि मोबाइल एप्लीकेशन का बाजार स्मार्ट फोन (उदाहरण के लिए आइ फोन) के कारण बना या फिर ऐप्स को उपभोक्ताओं तक पहुंचाने के लिए स्मार्ट फोन बनाए गए। लेकिन यह जानना कतई कठिन नहीं है कि नए इस्तेमाल के तरीकों ने मोबाइल फोन सेवा के कारोबार का तरीका बदल दिया है। मेटी लायके डेनमार्क की हैं और जॉगिंग के दौरान आपकी मेहनत पर नजर रखने वाले एप्लीकेशन बनाने वाली कंपनी की मालिक हैं। बताती हैं कि हजारों की संख्या में रोज लोग इसे डाउनलोड कर रहे हैं। इजरायल के निसिल बेनबेनस्ती भी यहां मौजूद हैं, जो टच फोन पर टाइप करने का तरीका बदल रहे हैं। नोकिया ओवी के जरिए यह एप्लीकेशन लोकप्रिय हो रहा है। निसिल व लायके जैसे कई लोग यहां जुटे हैं जो एक से एक नायाब ऐप्स लेकर आए हैं। ऐप्स का परिवार हजार तरह के गेम्स, फोटो, म्यूजिक, सूचना, मैप, विज्ञापन, शॉपिंग, बार कोड स्कैनिंग से लेकर डेटिंग के वास्ते दोस्त तलाशने से और नशे में होने पर कार चलाने से रोकने और टैक्सियों को आप तक पहुंचाने वाले इस्तेमालों तक फैल चुका है और लगातार बढ़ रहा है। ऐप्स के सहारे तमाम अन्य कारोबार और कंपनियां मोबाइल से जुड़ रहे हैं। दरअसल, ऐप्स की पूरी दुनिया एक खास किस्म के लोकतंत्र से निकली है। दुनिया की कुछ प्रमुख कंपनियों एप्पल, ब्लैकबेरी, माइक्रोसॉफ्ट और गूगल ने मिलकर स्मार्ट फोन के लिए बुनियादी संचालन की प्रणालियां विकसित कीं, जो बाजार में एप्पल, आइओएस 4, गूगल एंड्रायड, ब्लैकबेरी 6.0 और विंडोज फोन सेवन के नाम से जानी जाती हैं। इसके बाद का काम दुनिया की तकनीकी रचनात्मकता ने किया जिसके जरिए रोजाना दर्जनों नए एप्लीकेशन इंटरनेट के माध्यम से लोगों के फोन तक पहुंच रहे हैं। एप्लीकेशन की दुनिया अनंत हो चली है तभी तो अमेरिका का दूरसंचार नियामक एफसीसी अपने सरकारी सूचना तंत्र को फोन के स्मार्ट इस्तेमाल के लिए तैयार कर रहा है। इंटरनेट पर अब ऐसा भी एप्लीकेशन मौजूद है जिसके इस्तेमाल से दो लोगों की बातचीत को कूट भाषा (इनक्रिप्शन) में बदला जा सकता है। यानी किसी के लिए भी सुनना असंभव। ब्लैकबेरी से जूझ रहीं भारतीय खुफिया एजेंसियां पता नहीं इस एप्लीकेशन का क्या करेंगी। वैसे इस ऐप को बनाने वाली कंपनी क्रिप्टोजस के प्रमुख कहते हैं कि भारत में भी इसे डाउनलोड किया गया है|
केबल अभी और भी हैं
असांजे साहब का कहना है कि रोचकता अभी और भी है। पाकिस्तान तथा चीन सम्बंधी केबल आने तो दीजिए। केबल अभी और भी हैं। वैसे रोचकता अब भी कम नहीं है। यह अलग बात है कि पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए ही ये केबल मीठा-मीठा गप और कड़वा-कड़वा थू की तरह हैं। केबल आया कि मणिशंकर अय्यर को पेट्रोलियम मंत्री के पद से अमेरिका ने हटवाया। बस जी, आडवाणीजी ने पूछ लिया कि हमारा मंत्रिमंडल अब क्या अमेरिका में बनने लगा है? वैसे जब विकीलीक्स नहीं था तब भी यह आरोप तो लगते ही रहते थे कि हमारी आर्थिक नीतियां अमेरिका में बन रही हैं, फिर यह भी कहा जाने लगा कि हमारा बजट वाशिंगटन में बनता है। कांग्रेस के राज में भी कहा गया, एन.डी.ए. के राज में भी कहा गया। यदि अमेरिका की मनचाही हो जाती और प्रणवदा की जगह मोंटेक सिंह अहलुवालिया वित्तमंत्री होते तो शायद अब भी कहा जा रहा होता। बहरहाल, फिर यह कहा जाने लगा कि हमारी विदेश नीति अमेरिका में बनने लगी है। इसका अर्थ यह है कि हमारे यहां होली पर चीन की बनी पिचकारी या दीवाली पर चीन की बनी रोशनी की झालरें ही नहीं चलतीं। अमेरिका में बनीं चीजें भी खूब चल रही हैं और वे चीनी माल की तरह सस्ती भी नहीं, बल्कि काफी महंगी पड़ रही हैं। खैर, अब नया आरोप यह लगाया गया कि क्या हमारा मंत्रिमंडल अमेरिका में बनने लगा है? यह आरोप वामपंथियों ने नहीं लगाया जो कि अक्सर ऐसे आरोप लगाते रहते हैं। यह आरोप तो आडवाणीजी ने लगाया। इस पर मणि ने हंसते हुए कहा कि 'मैं तो उस पद पर था ही टेंपरेरी। इतने दिन बना रहा काफी है।'
फिर केबल आया कि पिछली बार सरकार ने सांसदों को खरीदकर विश्वास मत हासिल किया था। इस सिलसिले में पहला सवाल तो यही है कि क्या इसे रहस्योद्घाटन कहा जा सकता है? क्योंकि यह तो सदा से ही एक खुला रहस्य रहा है। फिर यह खुलासा कर विकीलीक्स ने सांसदों के भाव भी गिरा दिए। अभी तक भ्रम यह था कि तब एक-एक सांसद पच्चीस करोड़ में बिका। पर विकीलीक्स ने बताया कि उनकी कीमत तो बस दस करोड़ ही थी। और संसद में तो एक ही करोड़ दिखाए गए थे, हालांकि जिक्र तीन करोड़ का आया था। खैर, इस केबल से सरकार बहुत नाराज हो गई। प्रधानमंत्री ने कहा कि मैंने तो किसी से कहा नहीं था कि सांसदों के वोट खरीद लो। वैसे तो वे सांसद थे, किसी कम्पनी के शेयर तो थे नहीं, कि वे किसी ब्रोकर को कहते कि भई मेरे लिए भी कुछ खरीद लो। पर उनके यह कहने से तो लगता है कि वे चाहते तो कह भी सकते थे। लेकिन फिर भी कहते तो वे यही कि मैंने तो किसी को कहा नहीं था सांसदों का वोट खरीदने के लिए। पर उनकी यह नाराजगी तो कुछ भी नहीं थी। इससे ज्यादा नाराजगी तो उन्होंने यह बयान देते हुए दिखायी कि विपक्ष ने शोर तो तब भी मचाया था, पर जनता ने विपक्ष की बातों पर भरोसा ही नहीं किया था। इसीलिए तो उन्हें फिर से जिता दिया और भाजपा तथा वामपंथ की सीटें घटा दीं। वैसे प्रधानमंत्री को कभी चुनाव लड़के भी देख ही लेना चाहिए। उसके बिना जीत-हार के आनंद का पता नहीं चलता है। पर उनका यह बयान आते ही विपक्ष ने पकड़ लिया। वामपंथियों ने कहा-हिटलर भी यही कहता था, मोदी भी यही कहता है। आडवाणीजी ने कहा कि इस तर्क से तो राजीवजी पर लगे आरोप भी सही साबित होते हैं, क्योंकि वे चुनाव हार गए थे। पता नहीं वे ऐसे-ऐसे बयान क्यों देते हैं वे? आरोपों को सही-गलत साबित करने के लिए अदालतें हैं न। पर एक बार फिर यह गुजारिश की जा सकती है कि प्रधानमंत्री एक बार चुनाव लड़कर जरूर देखें। खैर, इस पर असांजे साहब ने कह दिया कि प्रधानमंत्री गलतबयानी कर रहे हैं। इस पर उत्साहित विपक्ष ने विशेषाधिकार हनन का नोटिस दे दिया है। खैर, फिर केबल आया कि भाजपा परमाणु करार के वैसे खिलाफ नहीं है जैसी दिखा रही है और यह विरोध तो बस पब्लिक को दिखाने के लिए है। वैसे यह कहा तो खूब जाता है कि पब्लिक बेवकूफ नहीं है, और कि वह सब जानती है। पर फिर भी उसे बेवकूफ बनाने में कसर कोई नहीं छोड़ता। हां, अलबत्ता भाजपा की यह शिकायत जरूर होती होगी कि जनता उसे समझती नहीं है। समस्या यह है कि न वह जनता को समझती है, न जनता उसे समझती है। फिर केबल आया मोदीजी के बारे में। वे फूलकर कुप्पा हो गए कि देखो मेरी कितनी सराहना की है अमेरिका ने। पर कल उसी अमेरिका ने उन्हें वीजा देने से इनकार कर दिया था। खैर, केबल अभी और भी हैं।
Tuesday, March 22, 2011
Thursday, March 17, 2011
लेजर तकनीक लाएगी इंटरनेट में नई तेजी
इंटरनेट की धीमी गति से जल्द ही निजात लि सकती है। एक नया लेजर उपकरण इंटरनेट के नए युग का सूत्रपात कर सकता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे कंप्यूटिंग न सिर्फ तेज हो जाएगी बल्कि ज्यादा विश्वसनीय भी बनेगी। सेंट्रल फ्लोरिडा यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर डेनिस डेप ने बेहद छोटे लेजर डायोड का निर्माण किया है। ये वर्तमान में इस्तेमाल किए जा रहे डायोड के मुकाबले काफी तीव्र रोशनी छोड़ते हैं। इस रोशनी से एक ही तरंग निकलती है जो उपकरण को सीडी प्लेयर, लेजर पाइंटर, कंप्यूटर के ऑप्टिकल माउस में इस्तेमाल के लिए आदर्श बनाती है। इससे डाटा ट्रांसफर की गति काफी तेज हो जाती है। अभी तक सबसे बड़ी चुनौती इस छोटे उपकरण की असफलता दर को लेकर थी। यूनिवर्सिटी के वक्तव्य के अनुसार, अधिक कार्यभार होने पर ये अच्छी तरह काम नहीं कर पाते थे और अत्यधिक दबाव इनमें दरार पैदा कर देता था। इसके छोटे आकार और गैर सेमीकंडक्टर सामग्री को निकालने का मतलब है कि नया उपकरण भारी डाटा ट्रांसफर में भी काफी बेहतर तरीके से काम कर सकता है, जो इंटरनेट की अगली पीढ़ी विकसित करने में काम का है। ऑप्टिकल घडि़यों, जीपीएस की सुनिश्चितता और हाई स्पीड वायरलैस डाटा कम्यूनिकेशन भी इस सूक्ष्म लेजर के इस्तेमाल से बढ़ जाएंगा। डेप ने कहा कि नए उपकरण ने दबाव की स्थिति के बावजूद काम में कोई बदलाव नहीं प्रदर्शित किया।
Sunday, March 13, 2011
क्रांति के नए औजार
कुछ वर्ष पहले जब एप्पल कंप्यूटर्स ने महात्मा गांधी की एक तसवीर का अपने सॉफ्टवेयर के विज्ञापन के लिए उपयोग किया था, तो उस घटना ने हमें कुछ अलग सोचने पर मजबूर किया था। तब मैं भी उन कुछ भारतीयों में से था, जो इससे बेचैन और दुखी हुआ था। यहां आदर्श पर व्यावसायिक हित को तरजीह दी गई थी।
हाल में टूनीशिया से लेकर मिस्र तक की घटनाओं में दो विपरीत दिशाओं में चलने वाली कॉरपोरेट प्रौद्योगिकी और उग्र सुधारवादी राजनीतिक परिकल्पना को एक साथ देखा गया। मध्य पूर्व में इंटरनेट और उसके अनुषंग माध्यमों ने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ गलियों और चौराहों पर लोगों को उतारने और अभूतपूर्व अहिंसक आंदोलनों के जरिये तानाशाही शासन को पलटने में सक्षम बनाया है। इसी तरह काहिरा और अलेक्जेंड्रिया में फेसबुक व ट्विटर के कुछ युवा संचालक प्रकारांतर से गांधीवादी विचारधारा के समर्थक के तौर पर ही नजर आए।
मिस्र में आंदोलनकारियों को अहिंसक तौर-तरीके अपनाने के निर्देश देने वाला जीन शार्प नाम का अमेरिकी गुरु था। महात्मा गांधी और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के विद्वान शार्प ने मिस्रवासियों को बताया कि कैसे निहत्थे नागरिक दमनकारी तानाशाह को हरा सकते हैं। कतर स्थित प्रवासी युवा मिस्रियों के एक दल ने परिवर्तन अकादमी (एकेडमी ऑफ चेंज) का गठन किया है, जो कि अपने नाम की तुलना में काम के कारण ही ज्यादा जाना जाता है। और इस अकादमी से जुड़े युवा वेबसाइट पर शार्प के गंभीर पाठक भी हैं। 83 वर्षीय जीन शार्प ट्विटर पर एक जाना-माना नाम हैं। नौ सौ पृष्ठों की पॉलिटिक्स ऑफ नॉन वायोलेंट ऐक्शन नाम की किताब के लेखक के तौर पर वह चर्चित हैं।
शार्प ने अहिंसक आंदोलनकारियों की एक समृद्ध परंपरा विकसित की है-ये आंदोलनकर्मी पुलिस और सरकारी अधिकारियों के सामने किसी के कपड़े भी उतार सकते हैं, किसी को सरकारी भवनों की रेलिंग से बांध सकते हैं और गलियों में व्यंग्यात्मक नुक्कड़ नाटक भी कर सकते हैं। शार्प ने गांधीवाद के एक मुख्य सूत्र को अच्छी तरह सीख लिया है : तानाशाही सत्ता तब लड़खड़ा सकती है, जब शोषित जनता उसकी हरकतों के लिए उसे शर्मिंदा और बेचैन करने में सक्षम हो। जब ऐसा होता है, तब जनता में तानाशाही का रौब भी खत्म हो जाता है।
जैसा कि मैंने तहरीर से आने वाली खबरों में सुना, काहिरा के मुख्य चौराहे पर त्योहार का मौसम था। वहां डेरा डाले परिवार और अनजाने लोग खाते, गाते, बात करते हुए विरोध कर रहे थे। यह घटना मुझे अगस्त, 1980 की याद दिला रही थी, जब मैं गैडांस्क में लेनिन शिपयार्ड से गुजर रहा था, जिसमें लेक वेलेसा ने पॉलिश जनरलों के साथ निर्णायक टकराव का नेतृत्व किया था। हालांकि मिस्र और दूसरी जगह हुए आंदोलनोंके संदर्भ में फेसबुक पर जो कुछ भी दिख रहा है, उसमें अपने अधिकारों की मांग कर रहे प्रदर्शनकारियों की तुलना में अभी राजनीतिक शक्ति की कोई प्रभावकारी छवि नहीं दिखती।
यहां यह रेखांकित करना गलत नहीं होगा कि गांधी स्वयं जनसंचार की नई प्रौद्योगिकी, खासकर सिनेमाई छवियों को अपनाने वालों में से थे। वर्ष1930 के दांडी मार्च के निपुण चित्रांकण ने शीघ्र ही नमक सत्याग्रह को विश्व-प्रसिद्ध घटना बना दिया था। दरअसल दांडी के लिए प्रस्थान करने से पहले बापू ने तीन फिल्म कर्मचारियों और कुछ फोटोग्राफरों को चुनकर अपने साथ कर लिया था। मोटरकार में गांधी के पीछे-पीछे चलकर उन्होंने उस पूरे अभियान की तसवीरें खींचीं, जो दुनिया भर में दिखाई गईं। धूल-धूसरित मैदान में लंबे डग भरते हुए अपने अनुयायियों का नेतृत्व करते महात्मा गांधी की छवि तब लाखों लोगों के मानस में कौंध गई थी।
अगर गांधी छवियों और सूचनाओं का मनमाफिक इस्तेमाल करने में कुशल थे, तो शानदार मौकों पर लोगों को इकट्ठा करने में भी माहिर थे। उसी तरह वे आयोजनों के कुशल शिल्पी भी थे। उन्होंने सालाना चाय पार्टी करने वाली कांग्रेस को एक चिरस्थायी आंदोलन में तबदील कर दिया।
राजनीतिक आंदोलन के संदर्भ में इन नई प्रौद्योगिकियों की सीमाओं को पहचानना भी महत्वपूर्ण है। इसके बावजूद इसकी ताकत को खारिज नहीं किया जा सकता। इंटरनेट सूचनाएं फैलाने का इतना प्रभावशाली माध्यम है कि यह तेजी से दमनकारी सत्ता का क्षय कर सकता है। लिहाजा हमें इसकी पहुंच का विस्तार करने की जरूरत है।
इसकी इसी विशेषता के कारण कई सरकारें इसके खिलाफ जाना पसंद करती हैं। मिस्र में प्रदर्शन के दौरान मुबारक ने इंटरनेट सेवा बंद करने की कोशिश की थी, अन्य अरब देशों में भी ऐसी कोशिश हुई। चीन में फेसबुक पर किसी तरह प्रतिबंध लगाया गया है। यहां तक कि अमेरिका में भी इंटरनेट के राजनीतिक उपयोग को लेकर दोहरा रवैया है। जो अमेरिका इंटरनेट की आजादी की वकालत करता है और तानाशाही सत्ताओं द्वारा इंटरनेट सेवा को बाधित करने से रोकने का दुनिया भर में अभियान चलाता है, उसी अमेरिका ने पिछले दिनों विकिलीक्स पर हमला बोला और उसे वेबसाइट बंद करने को कहा!
भारत की बात करें, तो यहां सरकार इंटरनेट सेवा को बाधित करने के लिए परेशान नहीं है, हां, बिजली की कमी इंटरनेट तक पहुंच को निश्चित रूप से बाधित करती है। वैसे भी इंटरनेट तक पहुंच सात करोड़ से कम ही लोगों की है, जो कि पूरी आबादी का छोटा सा हिस्सा है। भारत में आर्थिक गरीबी ज्यादातर लोगों को साइबर दुनिया से दूर रखती है।
क्या विडंबना है! गरीबी ही क्रांतियों का स्रोत रही है। लेकिन अब गरीबों और तकनीकी औजारों के जरिये क्रांति में मदद करने वाले के बीच गरीबी ही फासला पैदा कर रही है|
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