साइबर अपराधियों की बढ़त सेंधमारी ने दुनिया भर की सुरक्षा एंजेंसियों, बैंकों और आम इंसान को चिंता में डाल रखा है। इसी के मद्देनजर अब वैज्ञानिकों ने ऐसा अविष्कार किया है जो लोगों की परेशानी को कम कर सकता है। उन्होंने दुनिया का पहला ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार करने का दावा किया है जिसे हैक नहीं किया जा सकेगा और यह कंप्यूटर को ठप होने या दुर्भावनापूर्ण हमलों से बचा सकता है। एसईएल 4 माइक्रोकेर्नल नाम के इस सॉफ्टवेयर को आस्ट्रेलिया के आईसीटी रिसर्च सेंटर ऑफ एक्सेलेंस की कंपनी ओपेन केर्नल लैब के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक दल ने तैयार किया है। यह एक छोटा सा ऑपरेटिंग सिस्टम है जो कंप्यूटर के हार्डवेयर तक पहुंच को नियमित करता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इसकी अनोखी विशेषता यह है कि गणितीय रूप से भी इसका संचालन साबित हो चुका है, जो इसे अविश्वासयोग्य सॉफ्टवेयर से अलग करता है और इसे ठप होने से या दुर्भावनापूर्ण हमलों से बचाता है। भविष्य में यह सॉफ्टवेयर भरोसेमंद वित्तीय लेनदेन को सुनिश्चित कर सकता है। बैंक या शेयर बाजार के काम ग्राहक के मोबाइल फोन पर सुरक्षित रूप से संचालित हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि यह रक्षा विभाग को अपने आंकड़ों के लिए एक सुरक्षित और भरोसेमंद सेवा प्रदान कर सकता है। साथ ही, यह पेसमेकर जैसे प्रतिरोपित मेडिकल उपकरण के जीवन रक्षक कार्यकलापों को हैक होने से बचा सकता है। मुख्य शोधकर्ता गेरविन क्लेन ने बताया कि एसईएल 4 अभी तक इकलौता ऐसा सॉफ्टवेयर है जिसे गणीतीय रूप से साबित किया जा चुका है कि इसका सोर्स कोड विशिष्ट लक्षणों को एकदम सही लागू करता है। यह सॉफ्टवेयर हूबहू वैसा ही करता है जैसे इसके विशिष्ट लक्षण हैं। एक अन्य शोधकर्ता गेरनॉट हेसर ने बताया कि सॉफ्टवेयर के ऑपरेटिंग सिस्टम का प्रमाणीकरण 1970 से चल रहा है। हम ऐसा करने में कामयाब रहे।
Sunday, January 30, 2011
कभी हैक नहीं हो सकेगा यह सॉफ्टवेयर
साइबर अपराधियों की बढ़त सेंधमारी ने दुनिया भर की सुरक्षा एंजेंसियों, बैंकों और आम इंसान को चिंता में डाल रखा है। इसी के मद्देनजर अब वैज्ञानिकों ने ऐसा अविष्कार किया है जो लोगों की परेशानी को कम कर सकता है। उन्होंने दुनिया का पहला ऐसा सॉफ्टवेयर तैयार करने का दावा किया है जिसे हैक नहीं किया जा सकेगा और यह कंप्यूटर को ठप होने या दुर्भावनापूर्ण हमलों से बचा सकता है। एसईएल 4 माइक्रोकेर्नल नाम के इस सॉफ्टवेयर को आस्ट्रेलिया के आईसीटी रिसर्च सेंटर ऑफ एक्सेलेंस की कंपनी ओपेन केर्नल लैब के नेतृत्व में वैज्ञानिकों के एक दल ने तैयार किया है। यह एक छोटा सा ऑपरेटिंग सिस्टम है जो कंप्यूटर के हार्डवेयर तक पहुंच को नियमित करता है। वैज्ञानिकों ने बताया कि इसकी अनोखी विशेषता यह है कि गणितीय रूप से भी इसका संचालन साबित हो चुका है, जो इसे अविश्वासयोग्य सॉफ्टवेयर से अलग करता है और इसे ठप होने से या दुर्भावनापूर्ण हमलों से बचाता है। भविष्य में यह सॉफ्टवेयर भरोसेमंद वित्तीय लेनदेन को सुनिश्चित कर सकता है। बैंक या शेयर बाजार के काम ग्राहक के मोबाइल फोन पर सुरक्षित रूप से संचालित हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि यह रक्षा विभाग को अपने आंकड़ों के लिए एक सुरक्षित और भरोसेमंद सेवा प्रदान कर सकता है। साथ ही, यह पेसमेकर जैसे प्रतिरोपित मेडिकल उपकरण के जीवन रक्षक कार्यकलापों को हैक होने से बचा सकता है। मुख्य शोधकर्ता गेरविन क्लेन ने बताया कि एसईएल 4 अभी तक इकलौता ऐसा सॉफ्टवेयर है जिसे गणीतीय रूप से साबित किया जा चुका है कि इसका सोर्स कोड विशिष्ट लक्षणों को एकदम सही लागू करता है। यह सॉफ्टवेयर हूबहू वैसा ही करता है जैसे इसके विशिष्ट लक्षण हैं। एक अन्य शोधकर्ता गेरनॉट हेसर ने बताया कि सॉफ्टवेयर के ऑपरेटिंग सिस्टम का प्रमाणीकरण 1970 से चल रहा है। हम ऐसा करने में कामयाब रहे।
कंपनी बदलने का विकल्प
मोबाइल फोन के उपभोक्ताओं को अपना नंबर बदले बगैर ही सर्विस प्रोवाइडर बदलने की आजादी तो मिल गई है, लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि क्या इसमें वे बेहतर सुविधाएं प्राप्त कर सकेंगे। आज मोबाइल मार्केट में बडे़-बडे़ प्लेयर हैं और सभी उपभोक्ताओं के समक्ष एक-दूसरे बढ़कर लुभावने प्रस्ताव रख रहे हैं। मोबाइल नंबर पोर्टेबिलिटी (एमएनपी) लागू होने के बाद उपभोक्ताओं के मन एक बड़ी दुविधा पैदा हो गई है कि वे अपने मौजूदा प्रोवाइडर के प्रति वफादार रहें या फिर किसी नए प्रोवाइडर को अपनाएं। यह बदलाव उपभोक्ता के लिए आर्थिक दृष्टि से भारी भी पड़ सकता है क्योंकि वह नई कंपनी का जो भी प्लान चुनेगा, वह जरूरी नहीं कि उसके मौजूदा बिल के समकक्ष ही हो। मोबाइल पोर्टेबिलिटी एक बड़ी तकनीकी सुविधा जरूर है। सेल्युलर कंपनियों के कामकाज से बहुत से उपभोक्ता असंतुष्ट हैं। कभी आपका फोन आउट ऑफ रीच होता है तो कभी किसी इमारत में दाखिल होते ही फोन के सिगनल गायब हो जाते हैं। बिलिंग और कस्टमर केयर के मामले में भी अकसर शिकायतें आती रहती हैं। एसएमएस जैसी बुनियादी सुविधा में भी इन कंपनियों का रिकार्ड बहुत अच्छा नहीं है। ट्राई के डंडे के बावजूद कंपनियां अपने कामकाज में पारदर्शिता कायम रखने में विफल रही हैं। अब नंबर पोर्टेबिलिटी की आड़ में इन कंपनियों को अपना बिजनेस चमकाने का नया अवसर मिल गया है। एमएनपी का प्रचलन कुछ देशों में पहले से हो रहा है। भारत में पिछले साल इसे हरियाणा में लागू किया गया था। वहां करीब एक लाख मोबाइल उपभोक्ताओं ने अपने ऑपरेटर बदल लिए हैं। सिर्फ दो-ढाई महीने के भीतर इतनी बड़ी तादाद में ऑपरेटरों को बदलने का अर्थ साफ है कि उपभोक्ता उनकी सेवाओं से संतुष्ट नहीं हैं। मोबाइल मार्केट पर एमएनपी का कितना असर पड़ता है, इसका अंदाजा अगले छह महीनों में लग जाएगा। विभिन्न ऑपरेटरों के बीच इस बात की होड़ लगेगी कि वे अपने मौजूदा ग्राहकों को छिनने से कैसे रोकें और नए ग्राहक कैसे बनाएं। कुछ मामलों में इससे उपभोक्ताओं को फायदा भी हो सकती है क्योंकि विभिन्न नेटवर्क अपनी सेवाओं की खामियों को दूर करने के लिए विवश होंगे। एक बड़ा सवाल यह है कि उपभोक्ता के लिए एमएनपी कितनी लाभप्रद होगी। वह सिर्फ बेहतर सुविधा और बेहतर कस्टमर केयर प्राप्त करने की दृष्टि से ही अपना ऑपरेटर बदलने के बारे में सोचेगा। वह एक बेहतर टैरिफ पैकेज की भी अपेक्षा करेगा। लेकिन उसकी ये उम्मीदें तभी पूरी हो पाएंगी, जब ऑपरेटरों को लगेगा कि उनके उपभोक्ताओं की संख्या बढ़ रही है। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि बाजार पर एमएनपी का अधिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका अर्थ यह हुआ कि कंपनियां जितने नए उपभोक्ता हासिल करेंगी, लगभग उतने ही उनके हाथ से छिन जाएंगे। ऐसी स्थिति में वे अपनी सर्विस या कस्टमर केयर में कोई बड़ा भारी परिवर्तन नहीं कर पाएंगी। कोई भी उपभोक्ता सुविधाओं में सुधार की अपेक्षा से ही अपने ऑपरेटर को बदलेगा, लेकिन एक बड़ा प्रश्न यह है कि उसके लिए वास्तविक अंतर कितना होगा। ट्राई के सितंबर 2009 के आंकड़ों के मुताबिक उत्तर प्रदेश में कॉल सेटअप (कनेक्शन मिलने) की सफलता की दर सबसे कम 97.26 प्रतिशत थी और मुंबई में सबसे ज्यादा 99.99 फीसदी। इसी तरह पूरे देश में कॉल ड्राप की दर करीब तीन प्रतिशत थी। राजस्थान में यह दर सबसे कम 1.9 प्रतिशत थी। अच्छी आवाज के साथ कनेक्टिविटी के मामले में किसी भी ऑपरेटर का रिकॉर्ड शत-प्रतिशत नहीं रहा है। यह बात भी सभी जानते हैं कि कंपनियों के टैरिफ इतने कम हैं कि उपभोक्ता के समक्ष और कम टैरिफ के विकल्प की संभावना बहुत कम है। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)
Sunday, January 23, 2011
भारतीयों को भायी इंटरनेट शॉपिंग
घर या दफ्तर में बैठे-बैठे इंटरनेट के जरिए खरीदारी का विदेशी चलन अब भारतीयों को भी रास आने लगा है। देश में इंटरनेट शॉपिंग अभी शिशु काल में है, लेकिन डिस्काउंट की उंगली पकड़कर अब पांव पर चलने लगी है। बाजार जानकारों का अनुमान है कि फिलहाल देश में इंटरनेट शॉपिंग का बाजार 15 करोड़ डॉलर का है। वर्ष 2014 तक इसके एक अरब डॉलर के पार हो जाने का अनुमान है। ऑनलाइन शॉपिंग पोर्टल ट्रैड्स डॉट इन चलाने वाली इबिबो वेब प्राइवेट लिमिटेड के अध्यक्ष (ई-कॉमर्स) राहुल सेठी कहते हैं कि ऑफ रिटेल शॉपिंग यानी घर बैठे खरीदारी की बात की जाए तो अगले चार साल में यह बाजार 1.2 अरब डॉलर का हो जाएगा। उन्होंने कहा कि घर बैठे शॉपिंग में अभी सबसे ज्यादा 70 फीसदी हिस्सेदारी टीवी शॉपिंग की है। सेठी के मुताबिक घर से ही खरीदारी में अभी टीवी शॉपिंग ज्यादा लोकप्रिय है, लेकिन जिस तेजी से देश में इंटरनेट और ब्रॉडबैंड का विस्तार हो रहा है। अब तो थ्री जी टेलीफोनी सेवा भी शुरू हो चुकी है। उन्होंने बताया कि टीवी शॉपिंग की लोकप्रियता की मुख्य वजह यह है कि टेलीविजन की पहुंच काफी व्यापक है, लेकिन इस माध्यम की सीमाएं हैं। ग्राहकों को वही उत्पादन लेना पड़ता है, जो स्क्रीन पर दिखाया जाता है। मगर इंटरनेट शॉपिंग में कोई भी व्यक्ति सैकड़ों उत्पादों में बेहतर का चयन कर सकता है। शॉपिंग पोर्टल फ्लिपकार्टडॉटकॉम के सह संस्थापक और सीईओ सचिन बंसल कहते हैं कि ऑनलाइन शॉपिंग का बाजार तेजी से फल-फूल रहा है। उनका मानना है कि अगले कुछ साल तक यह बाजार सालाना 40-50 फीसदी से बढ़ेगा। विशेषज्ञों का कहना है कि इंटरनेट खरीदारी की लोकप्रियता की वजह डिस्काउंट भी है। शॉपिंग पोर्टलों द्वारा विभिन्न उत्पादों पर 10-70 फीसदी तक का डिस्काउंट दिया जा रहा है। यहां रिटेलर को अपने उत्पाद बेचने के लिए स्टोर की जरूरत नहीं होती। ऑनलाइन शॉपिंग में उसके और भी रोजाना के खर्चे बचते हैं। इसी लाभ को ग्राहकों तक डिस्काउंट के रूप में पहुंचाया जाता है। बंसल ने कहा कि किसी रिटेल आउटलेट पर आने जाने में होने वाली परेशानी, ट्रैफिक व पार्किंग की समस्या, मनपसंद उत्पाद को चुनने में दिक्कत, उत्पादों की तुलना में कठिनाई के चलते इंटरनेट के जरिए खरीदारी लोकप्रिय हो रही है। इबिबो के सेठी ने कहा कि हम अपने ग्राहकों को मोबाइल हैंडसेट पर 10-12 प्रतिशत, किताबों पर 30 प्रतिशत, कैमरे पर 30-40 प्रतिशत और परफ्यूम आदि पर तो 70 प्रतिशत तक डिस्काउंट की पेशकश कर रहे हैं। बकौल बंसल आज लोगों के पास समय की काफी कमी है। इंटरनेट शॉपिंग सेवा देने वालों का कहना है कि ऑर्डर मिलने के तीन चार दिन में माल ग्राहक तक पहुंच जाता है। माल पसंद नहीं आने पर ग्राहकों को 15 दिन के भीतर उसे लौटाने की भी सुविधा दी जाती है।
अब आएंगे चिप वाले एटीएम कार्ड!
हो सकता है कि आने वाले समय में बैंक की ओर से आपको मैग्नेटिक स्टि्रप वाले एटीएम कार्ड के बजाए चिप वाला कार्ड दिया जाए। एटीएम धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों को देखते हुए भारतीय रिजर्व बैंक जल्द ही बैंकों को एटीएम की उन्नत प्रणाली अपनाने के निर्देश दे सकता है। बाजार में खरीदारी करते समय पर्ची पर हस्ताक्षर करने की जगह आपको पिन का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। रिजर्व बैंक द्वारा गठित एक कार्यसमूह की रिपोर्ट में ये सुझाव दिए गए हैं। रिपोर्ट मिलने के बाद रिजर्व बैंक ने कहा है कि वह सुझावों पर जल्द अमल करेगा। सूचना सुरक्षा, इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग और प्रौद्योगिकी जोखिम प्रबंधन पर सुझाव देने के लिए गठित इस कार्यसमूह ने बैंकिंग धोखधड़ी पर पुलिस विभाग में एक अलग प्रकोष्ठ बनाने का भी सुझाव दिया है। केंद्रीय बैंक के कार्यकारी निदेशक जी. गोपालकृष्ण के नेतृत्व में गठित कार्यसमूह की रिपोर्ट में कहा गया है कि रिजर्व बैंक को एटीएम और बिक्री केंद्रों पर रखी जाने वाली मशीनों के उन्नयन के बारे में सोचना चाहिए। कार्यसमूह ने बैंकिंग उद्योग के कामकाज में सूचना प्रौद्योगिकी प्रणाली में व्यापक बदलाव और बैंकिंग सेवाओं को ज्यादा सुरक्षित बनाने की जरूरत पर भी जोर दिया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि ऑनलाइन धोखाधड़ी के मामलों में कई बार अधिकार क्षेत्र को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं है। इससे पुलिस में शिकायत करने पर असमंजस बना रहता है। साइबर अपराधों की शिकायत के लिए पुलिस विभाग में एक अलग प्रकोष्ठ बनाया जाना चाहिए। इसके साथ ही कार्यसमूह ने यह भी सुझाव दिया है कि डेबिट कार्ड से होने वाले लेनदेन के मामले में बिक्री केंद्रों पर पिन के जरिए ही कारोबार होना चाहिए। वर्तमान में यह हस्ताक्षर के आधार पर होता है। रिजर्व बैंक ने इस कार्यसमूह की स्थापना अप्रैल 2010 में की थी। रिपोर्ट कहती है कि ऑनलाइन धोखाधड़ी की प्रकृति को देखते हुए इस मामले में जांच एजेंसियों, औद्योगिक संगठनों, शिक्षण संस्थानों और सरकारों के बीच राष्ट्रीय व अतरराष्ट्रीय स्तर पर बेहतर तालमेल की जरूरत है। इसमें कहा गया है कि साइबर अपराध आमतौर पर एक करोड़ रुपये से कम राशि के होते हैं, लेकिन इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इसके मद्देनजर निदेशक मंडल की एक विशेष समिति को इनके बारे में लगातार पता रहना चाहिए, ताकि जरूरी कदम उठाए जाएं।
Friday, January 21, 2011
एवरनोट में सुरक्षित डाटा
इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों के लिए विभिन्न जरूरी फाइलों और आंकड़ों को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से एवरनोट एक बेहतर विकल्प है।
विभिन्न वेबसाइटों पर हमें जब अपनी जरूरत की कोई चीज नजर आती है तो हम उसे या तो किसी कॉपी में लिख लेते हैं या फिर कंप्यूटर पर ही कोई फाइल बनाकर उसे सेव कर लेते हैं। लेकिन प्राय: उनमें से कई चीजें या तो इधर-उधर हो जाती हैं या समय पर नहीं मिलतीं। इंनरनेट पर काम करने वालों के लिए ऐसी समस्या में अत्यंत ही मददगार है एवरनोट। जैसा कि नाम से ही जाहिर है, आप यहां नोट्स बना सकते हैं। इस सुविधा का लाभ उठाकर आप कई तरह की जरूरी सूचनाएं कंप्यूटर और इंटरनेट दोनों ही जगहों पर सेव कर सकते हैं। आप जब चाहें, उन फाइलों को अपडेट भी कर सकते हैं।
इसके लिए आपको कुछ खास करने की जरूरत नहीं है। बस इसकी वेबसाइट
http://www.evernote.com
पर जाइए और इसके प्रोग्राम को डाउनलोड कर लीजिए। अगर आप फोन पर भी इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं तो इस वेब एप्लीकेशन के फायदे आपके लिए और बढ़ जाएंगे, क्योंकि एवरनोट पर इसके लिए भी एक एप्लीकेशन मौजूद है। आपको इस पर अपना एकाउंट भी बनाना होगा। इससे कोई दूसरा व्यक्ति आपकी मर्जी के बिना आपकी फाइलों को नहीं देख सकेगा।
प्रोग्राम को इंस्टॉल करने के बाद आपको अपने ब्राउजर के लिए एक एड-ऑन भी इंस्टॉल करना पड़ेगा। इसे क्लिपर कहा जाता है। इसके आइकन पर क्लिक करके आप मनपसंद जानकारी या पेज को एवरनोट में भेज सकते हैं। इसमें आप पीडीएफ फाइल भी स्टोर कर सकते हैं। इसके साथ ही इस में ड्रैग ऐंड ड्रॉप और कॉपी-पेस्ट की सुविधा भी उपलब्ध है। बड़ी बात यह है कि एक बार डाटा स्टोर करने के बाद बिना इंटरनेट के भी आप उसको अपने कंप्यूटर पर देख सकते हैं। अगर आपके फोन में इंटरनेट है तो आप फोन पर भी अपनी सेव की हुई चीजों को देख सकते हैं।
खास बात यह है कि आप इस सुविधा का लाभ नि:शुल्क उठा सकते हैं, पर मुफ्त सेवा लिमिटेड है, यानी 40 एमबी प्रतिमाह तक। इससे आगे अगर आप अधिक क्षमता की प्रीमियर सेवा लेते हैं तो इसके लिए आपको भुगतान करना होगा।
पड़ोस में 4जी शुरू, देश में सिर्फ सुगबुगाहट
पिछले दशक में भले ही टेलीकॉम क्रांति से आमजन के हाथ मोबाइल पहुंच गया हो, मगर इसकी तकनीक के मामले में विकसित देश तो बहुत दूर, हम पड़ोसियों से भी पिछड़ गए हैं। देश में अभी 3जी सेवाएं पूरी तरह से चालू नहीं हो पाई हैं, वहीं चीन में इससे अगली पीढ़ी की तकनीक यानी 4जी को शुरू हुए करीब दो साल हो चुके हैं। पाकिस्तान 3जी और 4जी सेवा को एक साथ चालू करने की तैयारी में है। भारत में अभी 4जी को लेकर सुगबुगाहट ही शुरू हुई है। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) जून में 4जी से संबंधित परामर्श पत्र जारी कर सकता है। ट्राई के चेयरमैन जेएस. सरमा ने बताया कि परामर्श पत्र में 4जी के लिए स्पेक्ट्रम आवंटन और सेवा प्रदाताओं को इसके लाइसेंस देने जैसे विभिन्न पहलुओं पर गौर किया जाएगा। हालांकि नियामक ने अगले साल तक इसके शुरू होने की उम्मीद जताई है। देश में सरकारी कंपनियां- बीएसएनएल और एमटीएनएल भले ही थ्री जी सेवा दे रही हों, लेकिन निजी टेलीकॉम ऑपरेटर अब तक इस सेवा को पूरी तरह से शुरू नहीं कर पाए हैं। बीते साल की दूसरी छमाही में ही भारतीय एयरटेल, वोडाफोन और टाटा टेलीसर्विसेज जैसी निजी कंपनियों को 3जी स्पेक्ट्रम मिला है। पिछले साल 3जी स्पेक्ट्रम की नीलामी से सरकार को 67 हजार करोड़ रुपये से ज्यादा का राजस्व प्राप्त हुआ था। सरमा के मुताबिक ट्राई जल्द ही 2जी स्पेक्ट्रम की कीमतें 3जी स्पेक्ट्रम से जोड़ने पर सरकार को नई सिफारिशें सौंपेगा।
काले धन का दो हफ्तों में खुलासा
विकिलीक्स को मिली स्विस बैंकों के गुप्त खातों की सीडी
स्विस बैंकों में सर्वाधिक धनराशि भारतीयों ने ही जमा कराई है
14 खरब 56 अरब डालर बताई गई है भारतीयों की धनराशि, जो सभी अन्य देशों के खातेदारों की धनराशि से अधिक है
स्विट्जरलैंड के बैंकों में अपनी काली कमाई रखने वाले सफेदपोश लोगों का चेहरा जल्द ही बेनकाब होने जा रहा है। कई सनसनीखेज खुलासे करने वाली वेबसाइट विकिलीक्स को वह दो सीडी सोमवार को मिल गईं, जिनमें स्विस बैंकों में दुनिया भर के पूंजीपतियों और राजनीतिज्ञों के गुप्त खातों की जानकारी है। विकिलीक्स इन सीडी में मौजूद करीब 2000 नामों को दो हफ्तों के अंदर दुनिया के सामने लाने की तैयारी में है। इसके चलते भारत में भी कई राजनेताओं, राजनयिकों और नौकरशाहों की नींद उड़ गई है। उन्हें अपना नाम इसमें होने का डर सता रहा है।
प्रमुख स्विस बैंक जूलियस बेयर्स की केमैन आइलैंड शाखा के प्रमुख रह चुके रूडोल्फ एल्मर ने बैंक खातों के ब्योरे वाली दो सीडी लंदन में विकिलीक्स के संस्थापक जूलियन असांजे को सौंप दीं। एक प्रेस कांफ्रेंस में एल्मर ने कहा कि सीडी में एशिया, अफ्रीका, अमेरिका, ऑस्ट्रिया और यूरोप के रसूखदार लोगों के नाम हैं। इनमें दुनिया के 40 राजनीतिज्ञों और समाज का स्तंभ माने जाने वाले लोगों के नाम भी हैं। असांजे ने कहा कि वह गोपनीय खातों से संबंधित जानकारी की जांच पड़ताल के बाद इसे दो हफ्तों के अंदर जारी कर देंगे। उन्होंने कहा कि वह यह जानकारी ब्रिटेन की वित्तीय जांच एजेंसी सीरियस फ्रॉड ऑफिस को मुहैया कराने पर भी विचार करेंगे।
यह पहला मौका है जब दुनिया के जानेमाने और अमीर लोगों के गोपनीय खातों की जानकारी सार्वजनिक होने जा रही है। ऐसा होने पर स्विस बैंकिंग प्रणाली की दशकों से कायम गोपनीयता भी ध्वस्त हो जाएगी। एल्मर के खिलाफ जूलियस बेयर्स बैंक ने दस्तावेज चोरी करने का मामला दर्ज कराया है। बैंक ने सोमवार को जारी बयान में एल्मर की दी जानकारी को झूठा करार दिया और कहा कि गुप्त खातों के कोई आंकड़े नहीं रखे जाते। वहीं, एल्मर और असांजे भी स्विस बैंकिंग प्रणाली की गोपनीयता के खिलाफ यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय और स्विस अदालत में मामला दायर कराने की तैयारी कर रहे हैं।
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