Pages

Thursday, February 3, 2011

अपराधियों की हर छाप आएगी नजर


वैज्ञानिकों ने ऐसी प्रौद्योगिकी ईजाद करने का दावा किया है जो फोरेंसिक विज्ञान की तस्वीर बदल देगी। स्कॉटलैंड के वैज्ञानिकों का कहना है कि इस तकनीक की मदद से वे परिधानों, पर्दो और सोफे के कपड़ों जैसे घरेलू वस्त्रों से अंगुलियों के निशान उठा सकते हैं। द स्कॉट्समैन में प्रकाशित खबर के अनुसार पूर्व में फोरेंसिक अधिकारी केवल ठोस चीजों से ही अंगुलियों के निशान उठा पाते थे, लेकिन नई प्रौद्योगिकी की मदद से अब वस्त्रों और परिधानों से भी पूरी छाप ली जा सकेगी। यह महत्वपूर्ण खोज एबर्टे विश्वविद्यालय और स्कॉटिश पुलिस सेवा प्राधिकरण (एसपीएसए) प्रयोगशाला ने की है। एसपीएसए की अंगुलियों के निशान इकाई के प्रबंधक पाल डेकान ने कहा कि इस महत्वपूर्ण खोज के जरिए हम कई अन्य किस्म के मामलों पर भी गौर कर सकेंगे। अब एक प्रकार से ऐसी कोई चिकनी सतह नहीं रहेगी जहां से छाप लेने की संभावना न हो। यह तो महज शुरुआत है। इस प्रौद्योगिकी के तहत कपड़े के एक टुकड़े को वैक्यूम चेंबर में रखा जाता है और उस पर सोने की पतली परत बिछा दी जाती है। उसमें जस्ता मिलाया जाता है जो सोने से चिपक जाता है, लेकिन जहां दरार या अंगुलियों के निशान होते हैं वहां जस्ता नहीं चिपकता। जस्ता और स्वर्ण मिला कपड़ा फोटोग्राफ के नेगेटिव की तरह लगता है। उसमें अंगुलियों के निशान के हिस्से को छोड़ बाकी हिस्सा भूरा नजर आता है। वैज्ञानिकों ने स्कॉटलैंड की दो मौजूदा मशीन में से एक का इस्तेमाल किया। इन मशीनों का इस्तेमाल दशकों से चिकनी सतह वाली ठोस वस्तुओं से अंगुलियों के निशान लेने के लिए किया जाता है। वैक्यूम मेटल डिपोजिशन (वीएमडी) के इस्तेमाल के जरिए काम करने वाली यह मशीन मूलत: कार लैंप बनाने में प्रयुक्त की जाती थी। ऐसा पहली बार हुआ कि इसका इस्तेमाल वस्त्र से छाप उठाने के लिए विश्वस्त तरीके से किया गया है। खोज में पाया गया कि जिस वस्त्र में प्रति मिलीमीटर धागे की संख्या तीन से ज्यादा है, जैसे रेशम या नायलॉन, उसमें पूरी छाप आती है। अध्ययन का नेतृत्व करने वाले प्रोफेसर डेविड ब्रेमनर ने बताया कि यह अनुसंधान बेहद रोमांचक है जिसमें तकनीक के विकास की काफी ज्यादा झलक दिखाई गई है। उन्होंने कहा कि वस्त्र से अंगुलियों के निशान मुहैया कराके भविष्य में आपराधिक जांच और अपराधियों को पकड़ने में मदद मिल सकती है। वैज्ञानिकों को हालांकि इस बात में संदेह भी है कि इसके जरिए सभी मामलों को सुलझाया जा सकेगा। मगर उनका कहना है कि हर हफ्ते औसत एक मामले में ही वैज्ञानिक तरीका अपनाने की जरूरत पड़ती है।



No comments:

Post a Comment