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Friday, October 14, 2011

आकाश को और सस्ता करने की तैयारी


सूचना संचार तकनीक के जरिए विद्यार्थियों की पढ़ाई को नई दिशा देने के लिए सबसे सस्ते टैबलेट आकाश से सरकार को बहुत उम्मीदें हैं। लिहाजा उसकी मौजूदा 1125 रुपये की कीमत को और कम करने के उपायों पर दिमाग लगाना शुरू कर दिया गया है। इंतजार है तो बस शुरुआत में परीक्षण के तौर पर सभी राज्यों में भेजे गए टैबलेट का उपयोग करने वालों की फीडबैक का। सूत्रों के मुताबिक आकाश को लोगों के बीच उतारने के बाद उस पर मिली प्रतिक्रियाओं से मानव संसाधन विकास मंत्रालय उत्साहित है। मंत्रालय के राष्ट्रीय सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी शिक्षा मिशन (एनएमइ-आइसीटी) के तहत आइआइटी-राजस्थान की साझेदारी से तैयार इस टैबलेट के आने के बाद कंप्यूटर व लैपटॉप बनाने वाली दूसरी कंपनियां भी इस ओर निहार रही हैं। सरकार भी उन्हें सबसे सस्ता टैबलेट बनाने का मौका देने को तैयार है, लेकिन इसके पहले वह राज्यों में बतौर परीक्षण भेजे गए आकाश के बारे में सकारात्मक या नकारात्मक रिपोर्ट को जान लेना चाहती है। मंत्रालय के उच्चपदस्थ सूत्रों का कहना है, आकाश को बनाने वाली कंपनी की एक टैबलेट पर महज 1750 रुपये की लागत आई है। इस लागत ने आकाश के अधिकतम मूल्य की एक सीमा तय ही कर दी है, जिसे ऊपर नहीं, बल्कि अब नीचे ही आना है। आकाश को बनाने वाली कंपनी परिवहन एवं अन्य खर्चो को जोड़कर उसे सरकार को 2250 रुपये में दे रही है। वह भी तब, जब उसे सिर्फ एक लाख यूनिट बनाने के आर्डर दिए गए हैं। आगे सरकार को दस लाख और उसके बाद उससे भी कई गुना अधिक टैबलेट की खरीद करनी है। जाहिर है जब ज्यादा बड़े आर्डर होंगे तो मूल्य में और कमी आएगी।। गौरतलब है कि सरकार पहले ही कह चुकी है कि वह इसकी कीमत 500 रुपये (दस डॉलर) तक लाने का इरादा रखती है।

Wednesday, June 29, 2011

आरटीई से बाहर ही रहेंगे नवोदय विद्यालय


शिक्षा का अधिकार कानून के चलते दाखिलों को लेकर मुश्किलों से जूझ रहे देश के लगभग छह सौ नवोदय विद्यालय अब राहत की सांस ले सकते हैं। लगभग नौ महीने की कवायद के बाद कानून मंत्रालय ने दूसरों स्कूलों से बिल्कुल अलग इन आवासीय विद्यालयों को शिक्षा का अधिकार कानून (आरटीई) के दायरे से बाहर रखने पर रजामंदी दे दी है। सूत्रों के मुताबिक मानव संसाधन विकास मंत्रालय के तर्को और अटार्नी जनरल की फिर से राय लेने के बाद कानून मंत्रालय अंतत: नवोदय विद्यालयों को शिक्षा का अधिकार कानून की परिधि से बाहर रखने पर सहमत हो गया है। अलबत्ता उसने मानव संसाधन विकास मंत्रालय को इसके लिए जरूरी कदम उठाने को कहा है। सूत्र बताते हैं कि इसके लिए कानूनी प्रावधानों की रोशनी में स्पष्टीकरण की अधिसूचना जारी की जा सकती है, लेकिन शिक्षा का अधिकार कानून में संशोधन की बाबत एक विधेयक संसद में लंबित होने के कारण यह अभी संभव नहीं है। अलबत्ता उस संशोधन विधेयक के पारित होने के बाद इस बाबत जारी अधिसूचना में उसे पिछली तारीखों से लागू का प्रावधान किया जाना सकता है। गौरतलब है कि नवोदय विद्यालयों में दाखिले के लिए अखिल भारतीय स्तर पर हर साल फरवरी में प्रवेश परीक्षा होती है। नया शैक्षिक सत्र जुलाई में होना है, लेकिन कानूनी अड़चनों के चलते प्रवेश परीक्षा अभी नहीं हो सकी है। सूत्र बताते हैं कि कानून मंत्रालय की हरी झंडी मिलने के बाद अब जुलाई में ही प्रवेश परीक्षा कराने की तैयारी है। कोशिश है कि जुलाई के अंत तक दाखिले प्रक्रिया पूरी कर ली जाये, ताकि शैक्षिक सत्र शुरू होने में ज्यादा विलंब न होने पाए। शिक्षा का अधिकार कानून के प्रावधान के तहत किसी भी स्कूल में दाखिले के लिए बच्चे या उसके माता-पिता का स्क्रीनिंग टेस्ट (प्रवेश परीक्षा आदि) नहीं लिया जा सकता। साथ ही हर स्कूल में कमजोर वर्गो के छात्रों के लिए 25 प्रतिशत सीटें आरक्षित होंगी। चूंकि नवोदय विद्यालयों में दाखिले के लिए चयन का आधार प्रवेश परीक्षा है। नवोदय विद्यालयों के ऐसा न करने के कारण ही राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने नवोदय विद्यालयों में पिछले साल इस प्रक्रिया से हुए दाखिले को निरस्त करने का नोटिस दे दिया था। जाना जा सकता है कि देश के 596 नवोदय विद्यालयों में छठवीं कक्षा की लगभग 47 हजार सीटों पर दाखिले के लिए केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) देश भर में हर साल एक ही दिन में प्रवेश परीक्षा कराता है।


Wednesday, June 15, 2011

2050 में उड़ेगा भविष्य का हैरतअंगेज पारदर्शी विमान


भविष्य की विमान यात्रा दुर्लभ और हैरतअंगेज नजारों से भरपूर ही नहीं बल्कि एडवेंचर स्पोर्ट्स के शौकीनों के लिए यह बहुत ही सहज और सुलभ सफर होगा। 2050 तक उपलब्ध होने वाले यात्री विमान पारदर्शी होंगे। इससे उनकी बनावट कमजोर नहीं होगी बल्कि इस डिजाइन से वह विमान का ही नहीं बल्कि आसमान और धरती के खूबसूरत दृश्यों से रूबरू हो सकेंगे। ब्रिटिश कंपनी एयरबस ने अगले चालीस सालों में हवाई सफर की एक नई अवधारणा रच ली है। भविष्य के यह विमान सिर्फ बाहरी डिजाइन से ही नहीं बल्कि आंतरिक व्यवस्था और साज-सज्जा में भी क्रांतिकारी परिवर्तन लेकर आएंगे। इन विमानों में बिजनेस और इकॉनमी क्लास नहीं होंगे बल्कि इनकी जगह आराम करने के जोन लेंगे जो विमान के अगले हिस्से में होंगे। विमान के सामने और किनारे का अंदर-बाहर का पूरा दृश्य विमान के पारदर्शी होने के कारण बे-रोकटोक देखा जा सकेगा। कामकाज के लिए विमान के पिछले इलाके में एक अलग जोन बनाया जाएगा। इसके अलावा, मित्रों और बिजनेस एसोसिएट्स के साथ चर्चा-परिचर्चा के लिए विभिन्न प्रकार के पेयों से भरपूर बार भी होगा। विमान के अंदर की दीवारें रोशनी की जरूरत के मुताबिक बदल जाएंगी। केबिन की दीवारों की झिल्ली कमरे के तापमान को भी नियंत्रित करेगी। यही झिल्ली जरूरत पड़ने पर विमान को पारदर्शी भी बना देगी। ताकि यात्री बाहर का नजारा ले सकें। होलोग्राफिक तकनीक से गेम्स खेले जा सकेंगे। वर्चुअल गोल्फ से लेकर कई आउटडोर गेम भी संभव होंगे। यात्रियों के शरीर के तापमान से मिली ऊर्जा से मनोरंजक कार्यक्रम दिखाए जाएंगे। आरामदेह सीटें और अन्य तकनीकें तो फिर भी अस्तित्व में आई हैं लेकिन पर्यावरण के अनुकूल विमान की बॉडी को पारदर्शी बनाना और उसकी मजबूती को भी बरकरार रखने के लिए किस धातु का इस्तेमाल होगा यह अभी तक उजागर नहीं किया गया है। विमान के केबिनों में विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट से भरपूर हवा होगी। यात्रियों को मानसिक और शारीरिक आराम देने के लिए विमान में अरोमा थेरेपी, एक्यूप्रेशर आदि का भी इंतजाम रहेगा। इंटरएक्टिव जोन में बातचीत करने और लोगों से संपर्क करने का पूरा इंतजाम होगा। एयरबस की इस भावी लक्जरी सेवा पर कंपनी के इंजीनियरिंग एक्जिक्यूटिव वाइस प्रेसिडेंट चा‌र्ल्स चैंपियन का कहना है कि उनकी रीसर्च के मुताबिक 2050 में यात्री बिंदास सफर करना चाहेंगे। वह पर्यावरण का भरपूर ख्याल रखते हुए उसका भरपूर अनुभव भी करेंगे। एयरबस के इस विमान को बनाने पर लंदन के ग्रीनविच में स्थित प्रयोगशाला में काम चल रहा है।


Wednesday, June 1, 2011

संचार तकनीक के हर रास्ते में खुफिया खिड़की


वे केवल आपके फोन को टेप कर ही मुतमइन नहीं हैं। उन्हें आपका हर संवाद सुनना है, चाहे वह महाजटिल संचार तकनीक के जरिये हुआ हो, क्योंकि आपकी हिफाजत को हजार खतरे जो हैं। देश की खुफिया एजेंसियों ने वॉयस फोन और टेक्स्ट मैसेज से पार संचार की सभी अत्याधुनिक तकनीकों की निगरानी का फरमान जारी कर दिया है। तकनीकी क्षमताएं बनाने और निजी कंपनियों को राजी करने की टोपी दूरसंचार विभाग के सिर पर है। खुफिया एजेंसियों ने टैपिंग के लिए जो नई फरमाइशी लिस्ट सरकार को सौंपी है उसमें वे सारे माध्यम मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल गोपनीय संदेश भेजने में होता है। कूट भाषा (इनक्रिप्शन) इन तकनीकों की जान है। खुफिया एजेंसिया सिक्योर्ड सॉकेट लेयर (एसएसएल) और स्टेग्नोग्राफी से लेकर वीडियो चैट और तमाम पुश मेल तक के भीतर झांकना और परखना चाहती हैं। यह सूची मोबाइल मेल की नई पीढ़ी को समेट लेती है जिसमें नोकिया, मोटरोला, सेवेन नेटवर्क, विंडोज की मोबाइल मेल व हश मेल, जी मेल आदि शामिल हैं। कंप्यूटर, वायरलेस दूरसंचार, मोबाइल डिवाइस, नेटवर्किंग आदि सभी को अपनी दायरे में लेने वाली ये नई तकनीकें इनक्रिप्शन प्रणाली पर काम करती हैं, जिन्हें खोलने की कुंजी संवाद भेजने और पाने वाले या फिर उन कंपनियों के पास होती है जो यह सेवा देती हैं। यही वह पेंच है, जिसे लेकर दूरसंचार विभाग, गृह मंत्रालय और आपरेटर आपस में उलझे हैं। उनके बीच निगरानी के तरीके पर खींचतान कायम है। गृह मंत्रालय का साफ कहना है कि इनक्रिप्टेड संवाद या मेल खोलने में एजेंसियों की मदद करन को जिम्मा आपरेटरों का है और संवाद का ब्योरा सामान्य भाषा में लिखकर खुफिया एजेंसियों दिया जाना चाहिए। दूरसंचार विभाग का कहना है कि कूट भाषा वाले संदेशों को खोलने की कुंजियां एक सिस्टम में सुरक्षित की जाएं। खुफिया एजेंसियां जब चाहें उसके जरिये मैसेज खोल लें। दूरसंचार विभाग की एक उच्चस्तरीय समिति इस मामले को हल करने की कोशिश कर रही है, लेकिन लगता है कि इस मामले में खुफिया एजेंसियां भारी पड़ेंगी और गुप्त भाषा में गुंथे संवादों को खोलकर खुफिया विभाग को पढ़वाने का जिम्मा अंतत:, आपरेटरों के सिर आएगा। संवादों की तकनीकी गुत्थियां कोई भी खोले, अब आपकी गोपनीयता बरकरार रहना मुश्किल है.

अपनी सेना पर भरोसा नहीं करती पाकिस्तान सरकार


विकिलीक्स की मानें तो पाक सरकार का नेतृत्व अपनी सेना पर कतई भरोसा नहीं करता। खुफिया वेबसाइट की ओर से सार्वजनिक किए गए गुप्त अमेरिकी कूटनीतिक दस्तावेजों में बताया गया है कि पाक सरकार ने वॉशिंगटन से शिकायत की थी कि सेना को मिलने वाली सहायता के बारे में उसे अंधेरा में रखा जा रहा है। आतंक के खिलाफ युद्ध के लिए दिए जाने वाले धन का उपयोग सेना दूसरे कामों के लिए कर रही है। विकिलीक्स द्वारा डॉन अखबार को मुहैया कराए गए इन गुप्त संदेशों से इस बात का खुलासा हुआ है कि आतंकवाद निरोधी अभियान के लिए मिल रहे धन के इस्तेमाल को लेकर पाकिस्तान सरकार और ताकतवर सेना के बीच तनाव था। एक संदेश के मुताबिक, तत्कालीन वित्त मंत्री शौकत तरीन ने पूर्व अमेरिकी राजदूत एनी पीटरसन को नवंबर 2009 में एक मुलाकात के दौरान पाक सेना को अमेरिका से मिलने वाली राशि के बारे में बताने को कहा। तरीन ने कहा कि अमेरिकी सहायता पर आधारित सैन्य बजट को वह कम नहीं करेंगे, लेकिन यह साफ कर दिया कि उनके मंत्रालय को संपूर्ण बजटीय उद्दश्यों से इन बातों की जानकारी रखने की जरूरत है। उन्होंने अमेरिकी राजदूत को शिकायत की कि सेना प्रमुख जनरल अश्फाक परवेज कियानी यह सूचना उन तक नहीं पहंुचाते। सितंबर 2009 को एक अन्य बैठक में पीटरसन ने कहा कि अमेरिका ने सेना के लिए 37 करोड़ अमेरिकी डॉलर के उपकरण अपने पाकिस्तानी आतंकरोधी क्षमता कोष के माध्यम से खरीदा, लेकिन तरीन ने कहा कि उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है। एक कुटनीतिक संदेश में खुलासा किया गया कि नवंबर 2009 की बैठक के दौरान तरीन ने इस बात के आंकड़े पेश किए कि आतंक के खिलाफ युद्ध में पाक खर्चे को वहन करने के लिए दिए जाने वाली अमेरिकी राशि सेना या आतंक रोधी मकसदों के लिए खर्च नहीं की जा रही.

Wednesday, May 18, 2011

पाकिस्तान ने अमेरिका को बढ़ा चढ़ाकर दिए सेना के बिल


अफगानिस्तान में अमेरिकी सेना को पाकिस्तान द्वारा दी जा रही सुविधाओं के भुगतान के लिए अमेरिका को सौंपे गए बिल की राशियां पाकिस्तान ने गलत और बढ़ा- चढ़ा कर पेश की हैं। उसकी इस नापाक हरकत के चलते ओसामा बिन लादेन प्रकरण के बाद दोनों देशों के संबंधों में आई कड़वाहट कम होने की बजाए और बढ़ेगी। अमेरिकी अखबार वॉल स्ट्रीट जर्नल ने स्वीडिश वेबसाइट विकिलीक्स द्वारा हासिल किए अमेरिका के खुफिया केबलों के आधार पर तैयार की अपनी रिपोर्ट में यह दावा किया है। इन केबलों के अनुसार, पाकिस्तान साल 2006 से ऐसे फर्जी बिल अमेरिका को दे रहा है, मगर अमेरिकी अधिकारी इनमें से अधिकांश को अस्वीकार कर देते हैं। अखबार की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका ने पाकिस्तानी अधिकारियों द्वारा भेजे गए बिलों का 40 फीसदी भाग मंजूर नहीं किया है। बिल के इस हिस्से में सेना के खाने-पीने और रहन-सहन के खर्च का हिसाब दिया गया था। हालांकि इस संबंध में अभी अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने कोई टिप्पणी नहीं की है। अखबार ने दस्तावेजों और अमेरिकी अधिकारियों से बातचीत के आधार पर लिखा है कि पाकिस्तान अक्सर ऐसे गलत हिसाब-किताब वाले बिल अमेरिका को भेजता रहता है। इन बिलों में कई बार तो ऐसी चीजों का भी उल्लेख रहता है जिनका युद्ध के मैदान से कुछ लेना-देना नहीं होता। इससे पाकिस्तान के प्रति अविश्र्वास और बढ़ेगा। उदाहरण के तौर पर पाकिस्तानी सेना ने जनवरी 2009 से जून 2010 के बीच साफ-सफाई के संसाधनों और रसायनों में खर्च के लिए पांच करोड़ डॉलर (करीब 2.2 अरब रुपये) का बिल दिया था, लेकिन अमेरिका ने इसके लिए केवल आठ लाख डॉलर (करीब 36 करोड़ रुपये) ही मंजूर किए। 2009 में पाकिस्तान की सबसे बड़ी सैन्य इकाई ज्वाइंट स्टाफ ने सेना की खाद्य सामग्री, चिकित्सा सुविधा और वाहनों के रखरखाव के लिए पांच लाख, 80 हजार डॉलर (करीब 2.6 करोड़ रुपये) मांगे थे, लेकिन अमेरिका ने कोई भुगतान नहीं किया। 

Saturday, May 7, 2011

अब कंप्यूटर को मोड़ कर रख सकेंगे जेब में


अगर सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले समय में कार्यालयों में आज की तरह कंप्यूटर और फोन रखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। कनाडा के वैज्ञानिकों ने विशेष मैटीरियल से बना ऐसा स्मार्ट कंप्यूटर बनाया है, जो क्रेडिट कार्ड की तरह पतला और लचीला है। इसे पेपरफोन नाम दिया गया है। इसकी खासियत यह है कि जगह के अनुरूप उसमें फिट हो जाता है। यह नई तकनीक कंप्यूटर जगत में क्रांति ला देगी। प्रमुख शोधकर्ता रॉयल वर्टिगाल के मुताबिक 9.5 सेमी का यह स्मार्ट कंप्यूटर भविष्य में पतले हैंडसेट और कंप्यूटर की दुनिया में क्रांति लाएगा। इसमें यूजर्स को कंप्यूटर और मोबाइल फोन दोनों की सुविधाएं मिलेगी। इससे कॉल करने, संगीत बजाने, गूगल के मानचित्र को बड़ा करने, ई-बुक को पढ़ने के लिए स्क्रीन को टच करने या बटन को दबाने की जरूरत नहीं है। बल्कि इसके कमांड कोनों को मोड़ने और आगे-पीछे करने से नियंत्रित होंगे। अलग-अलग दिशा में मोड़ने के अलग कमांड होंगे। अपने लचीलेपन के कारण मौजूदा उपकरणों की तुलना में इसका रखरखाव में आसान होगा। यह आपकी जेब में भी आसानी से आ जाएगा। किंग्सटन में क्वींस यूनिवर्सिटी में ह्यूमन मीडिया लैब के निर्देशक वर्टिगाल ने कहा, यही भविष्य है। आने वाले पांच वर्षो में सब कुछ ऐसे ही बदल जाएगा। यह कंप्यूटर कागज की पतली शीट की तरह होगा। इस पर पेन से लिखा भी जा सकता है। इसके इस्तेमाल से भविष्य में कार्यालय में कंप्यूटर, कागज या प्रिंटर की जरूरत नहीं होगी। उन्होंने बताया कि इस पेपर कंप्यूटर के इस्तेमाल से कागजों की बचत होगी। एक तरह से यह पेपरलेस ऑफिस की कल्पना को पूरा कर सकता है। इसमें हर चीज डिजिटल रूप में संग्रहित रहेगी। नई जनरेशन का यह कंप्यूटर बेहद हल्का और पतला होगा जिसे आसानी से कहीं भी ले जाया जा सकता है। विशेषज्ञों ने एक ऐसा कंप्यूटर भी विकसित किया है, जिसे अपनी कलाई में बंाधा जा सकता है और उसे कलाई से हटाने पर नोटपैड की तरह उपयोग किया जा सकता है। इसे गेम चेंजिंग टेक्नोलॉजी नाम दिया गया है। इस तरह के तकनीकी बदलाव को बाजार में आने में पांच से दस साल लगेंगे। यह कंप्यूटर 10 मई को वैंकूवर में प्रदर्शित किया जाएगा।


Tuesday, May 3, 2011

इसरो ने बनाया सबसे तेज सुपर कम्प्यूटर


इसरो ने बनाया देश का सबसे तेज सुपर कंप्यूटर


भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने देश का सबस तेज सुपरकंप्यूटर बनाने में कामयाबी हासिल की है। इस सुपरकंप्यूटर का नाम सागा-220 दिया गया है। तिरुवनंतपुरम के व्रिकम साराभाई स्पेस सेंटर (वीएसएससी) में सतीश धवन सुपरकंप्यूटिंग फेसिलिटी द्वारा इसे तैयार किया गया है। इसके निर्माण पर करीब 14 करोड़ रुपये का खर्च आया है। संगठन के वक्तव्य के अनुसार, इसरो अध्यक्ष के. राधाकृष्णन ने इसका उद्घाटन किया। नई ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट (जीपीयू) आधारित सागा-220 (सुपरकंप्यूटर फॉर एयरोस्पेस विद जीपीयू आर्किटेक्चर 220 टेराफ्लॉप्स) का इस्तेमाल अंतरिक्ष वैज्ञानिक जटिल अंतरिक्षीय समस्याओं को सुलझाने में कर रहे हैं। सागा-220 को का डिजाइन और निर्माण पूरी तरह विक्रम साराभाई स्पेस सेंटर द्वारा किया गया है। लागत, ऊर्जा और जगह के हिसाब से देखा जाए तो मौजूदा जीपीयू सिस्टम पारंपरिक सीपीयू आधारित सिस्टम के मुकाबले कही ज्यादा फायदेमंद होता है। यह सिस्टम जहां प्रदूषण रहित है वहीं, सिर्फ 150 किलोवाट ऊर्जा की खपत करता है।


Friday, April 29, 2011

टाइपराइटर को टा टा!


टाइपराइटर का उत्पादन कर रही दुनिया की आखिरी कंपनी गोदरेज एंड बोयस ने अब इसका उत्पादन नहीं करने का फैसला लिया है। यह समय की मांग है किंतु सालों साल इस उपकरण का उत्पादन करने वाली कंपनी ने भारी मन से यह फैसला लिया होगा, कंपनी के कर्मचारियों और मालिकों की पीड़ा को समझा जा सकता है। कंपनी के पास लगभग 200 टाइपराइटर हैं जिन्हें वह एंटीक के बतौर उसी तरह बेच सकती है जिस तरह आज ग्रामोफोन लोगों के घरों में बैठक की शान बन गए हैं। अस्सी के दशक तक मीडिया में प्रिंट का दबदबा चरम पर था, है तो आज भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया के आगे इसकी छवि उतनी उजली नहीं बची। उस समय संपादकों द्वारा वही रचनाएं प्रकाशन के लिए स्वीकार की जाती थीं, जो सुपाठ्य अक्षरों में या टाइप की हुई होती थीं। न जाने कितने चलचित्रों की पटकथा भी इन्हीं टाइपराइटरों से कागजों पर उतरी होंगी। कहते हैं कि हॉलीवुड के मशहूर किरदार जेम्स बांड की सुपर-डुपर हिट फिल्मों के लेखक इयान फ्लेमिंग के पास एक सोने का बना टाइपराइटर था। 

दुनिया के चौधरी अमेरिका में हेनरी मिल ने वर्ष 1714 में इस मशीन का अविष्कार किया था। इसके लगभग डेढ़ सौ साल के लंबे सफर के बाद क्रिस्टोफर लामथ शोलेज द्वारा इसे वर्ष 1864 में अंतिम बार नया रूप दिया और तबसे इसका स्वरूप यही बना रहा। टाइपराइटर का व्यवसायिक उत्पादन 1867 में आरंभ हुआ था। 1950 का दशक आते-आते टाइपराइटर की लोकप्रियता लोगों के सार चढ़कर बोलने लगी। सरकारी कामकाज में इसका उपयोग जरूरी महसूस किया जाने लगा। इसी दौरान अमेरिकी कंपनी स्मिथ कोरोन ने दस लाख टाइपराइटर बेचकर रिकॉर्ड कायम किया। वर्ष 1953 में तो दुनिया भर में एक करोड़ 20 लाख टाइपराइटर बिके।

नब्बे के दशक के आगाज के साथ टाइपराइटर में एक बार फिर तब्दीली आई। उस दौरान सामान्य टाइपराइटर से डेढ़ गुना बड़े आकार का इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर बाजार में आया। इसमें मेमोरी थी, जिसमें कुछ प्रोफॉर्मा बनाकर सेव किए जा सकते थे। यह काफी लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इसमें टाइपिस्ट को एक ही पत्र को बार बार टाइप नहीं करना होता था। फिर भी, इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर की सांसें जल्द ही उखड़ गईं और इसका स्थान ले लिया कंप्यूटर ने।

कोर्ट-कचहरी और भवन-भूखंडों की रजिस्ट्री के लिए अर्जीनवीस कार्यालय में टाइपिंग की स्पीड देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते, जब वे टाइपिंग मशीन पर बैठे व्यक्ति को एक ही उंगली से फर्राटे के साथ टाइप करते देखते थे। टाइपिंग करने वाले का की-बोर्ड पर एक ही उंगली से निशाना गजब का होता था, जिसमें गलती की गुंजाइश ही नहीं होती थी। एक समय था जब टाइपिंग की परीक्षा ली जाती थी, जिसमें हर परीक्षार्थी को टाइपिंग मशीन साथ लाना अनिवार्य होता था। परीक्षा प्राप्त आवेदकों को स्टेनोग्राफर, टाइपिस्ट या क्लर्क की नौकरी में वरीयता भी मिला करती थी। एक समय ठक-ठक की आवाज के साथ गर्व से सीना ताने चलने वाला टाइपराइटर अब इतिहास की वस्तु हो गया है। कम ही जगहों पर टाइपराइटर दिखते हैं। भारतीय सिनेमा की जासूसी फिल्मों में टिक-टिक की आवाज के साथ शब्दों को कागज पर उतारने वाले टाइपराइटर के अक्षरों के माध्यम से अनेक अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाया जाता रहा है। कोर्ट कचहरी, अर्जीनवीस, समाचार पत्र, सरकारी कार्यालयों आदि में टाइपराइटर की आवाज बहुत ही मधुर हुआ करती थी। कालांतर में इसका स्थान कम्पयूटर के बेआवाज की-बोर्ड ने ले लिया। अब तो हर जगह डेक्सटॉप या लैपटॉप की ही धूम है। अस्सी का दशक के बीतने तक टाइपिंग सिखाने वालों की दुकानें रोशन हुआ करती थीं।

नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही कंप्यूटर ने अपनी आमद दे दी। धीरे-धीरे यह समाज पर छा गया। मुख्य तौर पर देखा जाए तो टाइपराइटर के लिए कंप्यूटर ही दुश्मन या सौतन साबित हुआ। टाईपिंग प्रशिक्षण के लिए खुले संेटर वीरान होने लगे, शॉर्टहैंड और टाइपिंग की विधा में से टाइपिंग भर जिंदा मानी जा सकती है, शॉर्टहैंड तो अब गुजरे जमाने की बात हो चली है। रही बात टाइपिंग सीखने की तो कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उंगलियां चलाते-चलाते बच्चे आसानी से टाइपिंग सीखने लगे हैं। हिंदी की टाइपिंग जरा मुश्किल है, लेकिन अंग्रेजी की टाइपिंग बेहद आसान मानी जाती है। अब तो हिंदी के शब्दों के स्टिकर की-बोर्ड पर लगाकर बच्चे आसानी से हिंदी में टाइप करने लगे हैं। हालात देखकर लगने लगा है मानो बच्चे मां के पेट से ही टाइपिंग सीखकर आ रहे हैं। तीस साल की हो रही पीढ़ी इस परिवर्तन की साक्षात गवाह मानी जा सकती है जिसने ठक-ठक से लेकर बेआवाज की-बोर्ड तक का सफर अपनी नंगी आंखों से देखा होगा। इस पूरे बदलाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि टाइपराइटर की जवान पीढ़ी कंप्यूटर का की-बोर्ड आज भी लोकप्रिय टाइपराइटर कंपनी रेमिंगटन के नाम पर आज भी धड़ल्ले से चल रहा है।

हर चीज जो पैदा होती है उसका अंत अवश्य ही होता है। कहा जाता है कि मनुष्य और उसके द्वारा निर्मित हर प्रोडक्ट कभी न कभी मृत्यु को प्राप्त होता है। उसका अवसान सुनिश्चित है। ठक-ठक की ध्वनि के साथ शब्दों को कागज पर उकेरने वाले टाइपराइटर ने लगभग 300 सालों तक एकछत्र राज्य किया, अंत में वह कंप्यूटर के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गया है।