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Wednesday, June 1, 2011

संचार तकनीक के हर रास्ते में खुफिया खिड़की


वे केवल आपके फोन को टेप कर ही मुतमइन नहीं हैं। उन्हें आपका हर संवाद सुनना है, चाहे वह महाजटिल संचार तकनीक के जरिये हुआ हो, क्योंकि आपकी हिफाजत को हजार खतरे जो हैं। देश की खुफिया एजेंसियों ने वॉयस फोन और टेक्स्ट मैसेज से पार संचार की सभी अत्याधुनिक तकनीकों की निगरानी का फरमान जारी कर दिया है। तकनीकी क्षमताएं बनाने और निजी कंपनियों को राजी करने की टोपी दूरसंचार विभाग के सिर पर है। खुफिया एजेंसियों ने टैपिंग के लिए जो नई फरमाइशी लिस्ट सरकार को सौंपी है उसमें वे सारे माध्यम मौजूद हैं जिनका इस्तेमाल गोपनीय संदेश भेजने में होता है। कूट भाषा (इनक्रिप्शन) इन तकनीकों की जान है। खुफिया एजेंसिया सिक्योर्ड सॉकेट लेयर (एसएसएल) और स्टेग्नोग्राफी से लेकर वीडियो चैट और तमाम पुश मेल तक के भीतर झांकना और परखना चाहती हैं। यह सूची मोबाइल मेल की नई पीढ़ी को समेट लेती है जिसमें नोकिया, मोटरोला, सेवेन नेटवर्क, विंडोज की मोबाइल मेल व हश मेल, जी मेल आदि शामिल हैं। कंप्यूटर, वायरलेस दूरसंचार, मोबाइल डिवाइस, नेटवर्किंग आदि सभी को अपनी दायरे में लेने वाली ये नई तकनीकें इनक्रिप्शन प्रणाली पर काम करती हैं, जिन्हें खोलने की कुंजी संवाद भेजने और पाने वाले या फिर उन कंपनियों के पास होती है जो यह सेवा देती हैं। यही वह पेंच है, जिसे लेकर दूरसंचार विभाग, गृह मंत्रालय और आपरेटर आपस में उलझे हैं। उनके बीच निगरानी के तरीके पर खींचतान कायम है। गृह मंत्रालय का साफ कहना है कि इनक्रिप्टेड संवाद या मेल खोलने में एजेंसियों की मदद करन को जिम्मा आपरेटरों का है और संवाद का ब्योरा सामान्य भाषा में लिखकर खुफिया एजेंसियों दिया जाना चाहिए। दूरसंचार विभाग का कहना है कि कूट भाषा वाले संदेशों को खोलने की कुंजियां एक सिस्टम में सुरक्षित की जाएं। खुफिया एजेंसियां जब चाहें उसके जरिये मैसेज खोल लें। दूरसंचार विभाग की एक उच्चस्तरीय समिति इस मामले को हल करने की कोशिश कर रही है, लेकिन लगता है कि इस मामले में खुफिया एजेंसियां भारी पड़ेंगी और गुप्त भाषा में गुंथे संवादों को खोलकर खुफिया विभाग को पढ़वाने का जिम्मा अंतत:, आपरेटरों के सिर आएगा। संवादों की तकनीकी गुत्थियां कोई भी खोले, अब आपकी गोपनीयता बरकरार रहना मुश्किल है.

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