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Thursday, April 7, 2011

मोबाइल फोन की अति के सबक


भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया सिमट गई है और जीवन-शैली में आए कोई भी सुविधाजनक या आकर्षक बदलाव दुनिया भर में बहुत तेजी से फैल सकते हैं। ऐसे कुछ बदलाव विशेष औद्योगिक उत्पादों से जुड़े होते हैं। इन उत्पादों को बेचने वाले भी उन बदलावों को बेहद आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। हाल के वर्षो में जीवन शैली बदलने वाला जो उत्पाद दुनिया में, विशेषकर हमारे देश में सबसे तेजी से फैला है वह है मोबाइल फोन। न केवल तेजी से मोबाइल फोन का उपयोग करोड़ों लोगों तक फैल गया है अपितु प्रति उपभोक्ता इसके उपयोग की अवधि भी लगातार बढ़ती जा रही है। इस तरह जब किसी नई तकनीक या उत्पाद का तेज प्रसार होता है, तो यह संभावना बनी रहती है कि इससे जुड़े खतरे भी उतनी ही तेजी से फैल जाएं। जिस तेजी से मोबाइल फोन जैसे नए उत्पाद का प्रसार हुआ है उसमें समय पर चेतावनी मिलने की संभावना कम हो जाती है। मान लीजिए कि कुछ खतरे दस वर्ष के बाद सामने आने की संभावना हो लेकिन इस अवधि तक करोड़ों लोग मोबाइल फोन का भरपूर उपयोग कर चुके होंगे और उनको इसके उपयोग की इतनी आदत बन चुकी होगी कि वे खतरे का पता चलने पर भी इसका उपयोग कम नहीं कर पाएंगे। ऐसे में नई तकनीकों का तेज प्रसार भी कई खतरों से भरा है। मोबाइल फोन के तेज प्रसार को प्रगति के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया गया है। विज्ञापन व प्रचार-प्रसार भी सबसे अधिक इस उत्पाद का हुआ है। जब किसी उत्पाद के साथ इतने बड़े आर्थिक हित जुड़े हों तो जाहिर है इसके खतरों या दुष्परिणामों को छिपाने या कम दर्शाने के प्रयास भी किए जाते हैं। इस कारण प्राय: महत्वपूर्ण जानकारी उपभोक्ताओं तक समय पर नहीं पहुंचती है। निश्चय ही लोगों को मोबाइल फोन से बहुत लाभ नजर आये, तभी उन्होंने इतनी तेजी से इसे अपने जीवन का जरूरी हिस्सा बनाया। पर सवाल यह है कि यदि उन्हें मोबाइल फोन से जुड़े सभी खतरों की पूरी जानकारी होती तब उनकी क्या प्रतिक्रिया होती? अब देर से ही सही, पर मोबाइल फोन से जुड़े विभिन्न खतरों के बारे में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध होने लगी है। भारतीय सरकार के संचार व सूचना तकनीक मंत्रालय ने हाल में मोबाइल फोन से जुड़े खतरों के अध्ययन के लिए एक अंतरमंत्रालय समिति का गठन किया। जिसने अपनी रिपोर्ट में बताया कि मोबाइल फोन व इनके टावर से निकलने वाले रेडियेशन या विकिरण से स्वास्थ्य संबंधी कई खतरे जुड़े हैं जैसे याददाश्त कमजोर होना, ध्यान केंद्रित न कर पाना, पाचन तंत्र में गड़बड़ी होना, अनिद्रा, सिरदर्द, थकान, हृदय स्पंदन, प्रतिक्रिया में देरी आदि। समिति ने बताया कि चिड़िया-गौरेया, मधुमक्खी, तितली, आदि कीटों की संख्या में कमी के लिए भी मोबाइल टावर से होने वाले रेडियेशन बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। इससे पहले जेएनयू के प्रो. जितेंद्र बेहारी का इस विषय पर अनुसंधान भी सुर्खियों में आया था। इस अनुसंधान का निष्कर्ष यह है कि मोबाइल का अधिक समय तक इस्तेमाल करना खतरनाक तो अवश्य है, पर यह कितना घातक होगा यह कई बातों पर निर्भर होगा- जैसे कि मोबाइल फोन का उपयोग करने वाले व्यक्ति की उम्र कितनी है, उसे पहले से कौन सी बीमारी है, वह कितने समय तक फोन उपयोग करता है तथा उसके फोन की क्वालिटी कैसी है। विशेष परिस्थितियों में मोबाइल फोन का उपयोग हृदय रोग, दिमाग का कैंसर, आर्थराइटिस, अल्जाइमर, नपुसंकता तथा जल्द बुढ़ापा आने की संभावना बढ़ा सकता है। मोबाइल के अधिक उपयोग से रेडिएशन शरीर का पानी भी सोख लेता है जिससे कारण कई बीमारियां उत्पन्न होती है। मोबाइल फोन तथा इसके टावर से सबसे अधिक खतरा छोटे बच्चों को है। इसलिए छोटे बच्चों को इसके कुप्रभाव से बचा कर रखना सबसे जरूरी है। इस खतरे को कम करने के लिए कुछ सावधानियां बरती जा सकती हैं। जहां तक संभव हो, लैंड लाईन फोन का उपयोग करना चाहिए। मोबाइल का उपयोग बेहद जरूरी बात के लिए करना चाहिए। लंबी बात मोबाइल पर नहीं करनी चाहिए। कमजोर सिग्नल की स्थिति में भी मोबाइल के उपयोग से बचना चाहिए क्योंकि ऐसे में रेडिएशन ज्यादा निकलता है। फोन को पास रख कर न सोएं, विशेष तौर पर इसे सिर व तकिए से दूर रखें। रात में इसे स्विच ऑफ कर देना चाहिए। बच्चों को मोबाइल से दूर रखना बेहद जरूरी है। मोबाइल टावर के पास न रहें तथा इन्हें रिहायशी स्थान से हटाने के लिए कार्यवाही करने की जरूरत है। स्कूलों के निकट तो टावर कदापि नहीं होने चाहिए। इसके साथ ही सरकार को बड़ा नीतिगत फैसला लेना होगा कि यदि मोबाइल फोन का प्रचार-प्रसार किया जाए तो साथ ही इनके खतरों व इससे जुड़ी सावधानियों के बारे में भी लोगों को जानकारी देनी होगी। सरकार को स्वयं भी इन खतरों व सावधानियों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। टावर संबंधी स्पष्ट व सख्त नीतियां अपनाई जानी चाहिए ताकि इनके रेडिएशन की चपेट में आकर किसी का स्वास्थ्य तबाह न हो। मोबाइल उपभोक्ता भी बेहतर क्वालिटी व बचाव साधनों से लैस मोबाइल फोन खरीदकर अपने लिए खतरे कम कर सकते हैं, हालांकि गरीब उपभोक्ताओं के लिए ऐसा बचाव कठिन है। इसके साथ ही अन्य तरह के इलैक्ट्रोमेगनैटिक प्रदूषण को कम करने के प्रयास भी जरूरी हैं। गर्म जलवायु व शरीर की कमजोरी के कारण भी भारत में यह खतरे पश्चिमी विकसित देशों से अधिक हैं।



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