टाइपराइटर का उत्पादन कर रही दुनिया की आखिरी कंपनी गोदरेज एंड बोयस ने अब इसका उत्पादन नहीं करने का फैसला लिया है। यह समय की मांग है किंतु सालों साल इस उपकरण का उत्पादन करने वाली कंपनी ने भारी मन से यह फैसला लिया होगा, कंपनी के कर्मचारियों और मालिकों की पीड़ा को समझा जा सकता है। कंपनी के पास लगभग 200 टाइपराइटर हैं जिन्हें वह एंटीक के बतौर उसी तरह बेच सकती है जिस तरह आज ग्रामोफोन लोगों के घरों में बैठक की शान बन गए हैं। अस्सी के दशक तक मीडिया में प्रिंट का दबदबा चरम पर था, है तो आज भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया के आगे इसकी छवि उतनी उजली नहीं बची। उस समय संपादकों द्वारा वही रचनाएं प्रकाशन के लिए स्वीकार की जाती थीं, जो सुपाठ्य अक्षरों में या टाइप की हुई होती थीं। न जाने कितने चलचित्रों की पटकथा भी इन्हीं टाइपराइटरों से कागजों पर उतरी होंगी। कहते हैं कि हॉलीवुड के मशहूर किरदार जेम्स बांड की सुपर-डुपर हिट फिल्मों के लेखक इयान फ्लेमिंग के पास एक सोने का बना टाइपराइटर था।
दुनिया के चौधरी अमेरिका में हेनरी मिल ने वर्ष 1714 में इस मशीन का अविष्कार किया था। इसके लगभग डेढ़ सौ साल के लंबे सफर के बाद क्रिस्टोफर लामथ शोलेज द्वारा इसे वर्ष 1864 में अंतिम बार नया रूप दिया और तबसे इसका स्वरूप यही बना रहा। टाइपराइटर का व्यवसायिक उत्पादन 1867 में आरंभ हुआ था। 1950 का दशक आते-आते टाइपराइटर की लोकप्रियता लोगों के सार चढ़कर बोलने लगी। सरकारी कामकाज में इसका उपयोग जरूरी महसूस किया जाने लगा। इसी दौरान अमेरिकी कंपनी स्मिथ कोरोन ने दस लाख टाइपराइटर बेचकर रिकॉर्ड कायम किया। वर्ष 1953 में तो दुनिया भर में एक करोड़ 20 लाख टाइपराइटर बिके।
नब्बे के दशक के आगाज के साथ टाइपराइटर में एक बार फिर तब्दीली आई। उस दौरान सामान्य टाइपराइटर से डेढ़ गुना बड़े आकार का इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर बाजार में आया। इसमें मेमोरी थी, जिसमें कुछ प्रोफॉर्मा बनाकर सेव किए जा सकते थे। यह काफी लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इसमें टाइपिस्ट को एक ही पत्र को बार बार टाइप नहीं करना होता था। फिर भी, इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर की सांसें जल्द ही उखड़ गईं और इसका स्थान ले लिया कंप्यूटर ने।
कोर्ट-कचहरी और भवन-भूखंडों की रजिस्ट्री के लिए अर्जीनवीस कार्यालय में टाइपिंग की स्पीड देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते, जब वे टाइपिंग मशीन पर बैठे व्यक्ति को एक ही उंगली से फर्राटे के साथ टाइप करते देखते थे। टाइपिंग करने वाले का की-बोर्ड पर एक ही उंगली से निशाना गजब का होता था, जिसमें गलती की गुंजाइश ही नहीं होती थी। एक समय था जब टाइपिंग की परीक्षा ली जाती थी, जिसमें हर परीक्षार्थी को टाइपिंग मशीन साथ लाना अनिवार्य होता था। परीक्षा प्राप्त आवेदकों को स्टेनोग्राफर, टाइपिस्ट या क्लर्क की नौकरी में वरीयता भी मिला करती थी। एक समय ठक-ठक की आवाज के साथ गर्व से सीना ताने चलने वाला टाइपराइटर अब इतिहास की वस्तु हो गया है। कम ही जगहों पर टाइपराइटर दिखते हैं। भारतीय सिनेमा की जासूसी फिल्मों में टिक-टिक की आवाज के साथ शब्दों को कागज पर उतारने वाले टाइपराइटर के अक्षरों के माध्यम से अनेक अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाया जाता रहा है। कोर्ट कचहरी, अर्जीनवीस, समाचार पत्र, सरकारी कार्यालयों आदि में टाइपराइटर की आवाज बहुत ही मधुर हुआ करती थी। कालांतर में इसका स्थान कम्पयूटर के बेआवाज की-बोर्ड ने ले लिया। अब तो हर जगह डेक्सटॉप या लैपटॉप की ही धूम है। अस्सी का दशक के बीतने तक टाइपिंग सिखाने वालों की दुकानें रोशन हुआ करती थीं।
नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही कंप्यूटर ने अपनी आमद दे दी। धीरे-धीरे यह समाज पर छा गया। मुख्य तौर पर देखा जाए तो टाइपराइटर के लिए कंप्यूटर ही दुश्मन या सौतन साबित हुआ। टाईपिंग प्रशिक्षण के लिए खुले संेटर वीरान होने लगे, शॉर्टहैंड और टाइपिंग की विधा में से टाइपिंग भर जिंदा मानी जा सकती है, शॉर्टहैंड तो अब गुजरे जमाने की बात हो चली है। रही बात टाइपिंग सीखने की तो कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उंगलियां चलाते-चलाते बच्चे आसानी से टाइपिंग सीखने लगे हैं। हिंदी की टाइपिंग जरा मुश्किल है, लेकिन अंग्रेजी की टाइपिंग बेहद आसान मानी जाती है। अब तो हिंदी के शब्दों के स्टिकर की-बोर्ड पर लगाकर बच्चे आसानी से हिंदी में टाइप करने लगे हैं। हालात देखकर लगने लगा है मानो बच्चे मां के पेट से ही टाइपिंग सीखकर आ रहे हैं। तीस साल की हो रही पीढ़ी इस परिवर्तन की साक्षात गवाह मानी जा सकती है जिसने ठक-ठक से लेकर बेआवाज की-बोर्ड तक का सफर अपनी नंगी आंखों से देखा होगा। इस पूरे बदलाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि टाइपराइटर की जवान पीढ़ी कंप्यूटर का की-बोर्ड आज भी लोकप्रिय टाइपराइटर कंपनी रेमिंगटन के नाम पर आज भी धड़ल्ले से चल रहा है।
हर चीज जो पैदा होती है उसका अंत अवश्य ही होता है। कहा जाता है कि मनुष्य और उसके द्वारा निर्मित हर प्रोडक्ट कभी न कभी मृत्यु को प्राप्त होता है। उसका अवसान सुनिश्चित है। ठक-ठक की ध्वनि के साथ शब्दों को कागज पर उकेरने वाले टाइपराइटर ने लगभग 300 सालों तक एकछत्र राज्य किया, अंत में वह कंप्यूटर के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गया है।
दुनिया के चौधरी अमेरिका में हेनरी मिल ने वर्ष 1714 में इस मशीन का अविष्कार किया था। इसके लगभग डेढ़ सौ साल के लंबे सफर के बाद क्रिस्टोफर लामथ शोलेज द्वारा इसे वर्ष 1864 में अंतिम बार नया रूप दिया और तबसे इसका स्वरूप यही बना रहा। टाइपराइटर का व्यवसायिक उत्पादन 1867 में आरंभ हुआ था। 1950 का दशक आते-आते टाइपराइटर की लोकप्रियता लोगों के सार चढ़कर बोलने लगी। सरकारी कामकाज में इसका उपयोग जरूरी महसूस किया जाने लगा। इसी दौरान अमेरिकी कंपनी स्मिथ कोरोन ने दस लाख टाइपराइटर बेचकर रिकॉर्ड कायम किया। वर्ष 1953 में तो दुनिया भर में एक करोड़ 20 लाख टाइपराइटर बिके।
नब्बे के दशक के आगाज के साथ टाइपराइटर में एक बार फिर तब्दीली आई। उस दौरान सामान्य टाइपराइटर से डेढ़ गुना बड़े आकार का इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर बाजार में आया। इसमें मेमोरी थी, जिसमें कुछ प्रोफॉर्मा बनाकर सेव किए जा सकते थे। यह काफी लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इसमें टाइपिस्ट को एक ही पत्र को बार बार टाइप नहीं करना होता था। फिर भी, इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर की सांसें जल्द ही उखड़ गईं और इसका स्थान ले लिया कंप्यूटर ने।
कोर्ट-कचहरी और भवन-भूखंडों की रजिस्ट्री के लिए अर्जीनवीस कार्यालय में टाइपिंग की स्पीड देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते, जब वे टाइपिंग मशीन पर बैठे व्यक्ति को एक ही उंगली से फर्राटे के साथ टाइप करते देखते थे। टाइपिंग करने वाले का की-बोर्ड पर एक ही उंगली से निशाना गजब का होता था, जिसमें गलती की गुंजाइश ही नहीं होती थी। एक समय था जब टाइपिंग की परीक्षा ली जाती थी, जिसमें हर परीक्षार्थी को टाइपिंग मशीन साथ लाना अनिवार्य होता था। परीक्षा प्राप्त आवेदकों को स्टेनोग्राफर, टाइपिस्ट या क्लर्क की नौकरी में वरीयता भी मिला करती थी। एक समय ठक-ठक की आवाज के साथ गर्व से सीना ताने चलने वाला टाइपराइटर अब इतिहास की वस्तु हो गया है। कम ही जगहों पर टाइपराइटर दिखते हैं। भारतीय सिनेमा की जासूसी फिल्मों में टिक-टिक की आवाज के साथ शब्दों को कागज पर उतारने वाले टाइपराइटर के अक्षरों के माध्यम से अनेक अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाया जाता रहा है। कोर्ट कचहरी, अर्जीनवीस, समाचार पत्र, सरकारी कार्यालयों आदि में टाइपराइटर की आवाज बहुत ही मधुर हुआ करती थी। कालांतर में इसका स्थान कम्पयूटर के बेआवाज की-बोर्ड ने ले लिया। अब तो हर जगह डेक्सटॉप या लैपटॉप की ही धूम है। अस्सी का दशक के बीतने तक टाइपिंग सिखाने वालों की दुकानें रोशन हुआ करती थीं।
नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही कंप्यूटर ने अपनी आमद दे दी। धीरे-धीरे यह समाज पर छा गया। मुख्य तौर पर देखा जाए तो टाइपराइटर के लिए कंप्यूटर ही दुश्मन या सौतन साबित हुआ। टाईपिंग प्रशिक्षण के लिए खुले संेटर वीरान होने लगे, शॉर्टहैंड और टाइपिंग की विधा में से टाइपिंग भर जिंदा मानी जा सकती है, शॉर्टहैंड तो अब गुजरे जमाने की बात हो चली है। रही बात टाइपिंग सीखने की तो कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उंगलियां चलाते-चलाते बच्चे आसानी से टाइपिंग सीखने लगे हैं। हिंदी की टाइपिंग जरा मुश्किल है, लेकिन अंग्रेजी की टाइपिंग बेहद आसान मानी जाती है। अब तो हिंदी के शब्दों के स्टिकर की-बोर्ड पर लगाकर बच्चे आसानी से हिंदी में टाइप करने लगे हैं। हालात देखकर लगने लगा है मानो बच्चे मां के पेट से ही टाइपिंग सीखकर आ रहे हैं। तीस साल की हो रही पीढ़ी इस परिवर्तन की साक्षात गवाह मानी जा सकती है जिसने ठक-ठक से लेकर बेआवाज की-बोर्ड तक का सफर अपनी नंगी आंखों से देखा होगा। इस पूरे बदलाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि टाइपराइटर की जवान पीढ़ी कंप्यूटर का की-बोर्ड आज भी लोकप्रिय टाइपराइटर कंपनी रेमिंगटन के नाम पर आज भी धड़ल्ले से चल रहा है।
हर चीज जो पैदा होती है उसका अंत अवश्य ही होता है। कहा जाता है कि मनुष्य और उसके द्वारा निर्मित हर प्रोडक्ट कभी न कभी मृत्यु को प्राप्त होता है। उसका अवसान सुनिश्चित है। ठक-ठक की ध्वनि के साथ शब्दों को कागज पर उकेरने वाले टाइपराइटर ने लगभग 300 सालों तक एकछत्र राज्य किया, अंत में वह कंप्यूटर के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गया है।