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Friday, April 29, 2011

टाइपराइटर को टा टा!


टाइपराइटर का उत्पादन कर रही दुनिया की आखिरी कंपनी गोदरेज एंड बोयस ने अब इसका उत्पादन नहीं करने का फैसला लिया है। यह समय की मांग है किंतु सालों साल इस उपकरण का उत्पादन करने वाली कंपनी ने भारी मन से यह फैसला लिया होगा, कंपनी के कर्मचारियों और मालिकों की पीड़ा को समझा जा सकता है। कंपनी के पास लगभग 200 टाइपराइटर हैं जिन्हें वह एंटीक के बतौर उसी तरह बेच सकती है जिस तरह आज ग्रामोफोन लोगों के घरों में बैठक की शान बन गए हैं। अस्सी के दशक तक मीडिया में प्रिंट का दबदबा चरम पर था, है तो आज भी इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन इलेक्ट्रॉनिक और वेब मीडिया के आगे इसकी छवि उतनी उजली नहीं बची। उस समय संपादकों द्वारा वही रचनाएं प्रकाशन के लिए स्वीकार की जाती थीं, जो सुपाठ्य अक्षरों में या टाइप की हुई होती थीं। न जाने कितने चलचित्रों की पटकथा भी इन्हीं टाइपराइटरों से कागजों पर उतरी होंगी। कहते हैं कि हॉलीवुड के मशहूर किरदार जेम्स बांड की सुपर-डुपर हिट फिल्मों के लेखक इयान फ्लेमिंग के पास एक सोने का बना टाइपराइटर था। 

दुनिया के चौधरी अमेरिका में हेनरी मिल ने वर्ष 1714 में इस मशीन का अविष्कार किया था। इसके लगभग डेढ़ सौ साल के लंबे सफर के बाद क्रिस्टोफर लामथ शोलेज द्वारा इसे वर्ष 1864 में अंतिम बार नया रूप दिया और तबसे इसका स्वरूप यही बना रहा। टाइपराइटर का व्यवसायिक उत्पादन 1867 में आरंभ हुआ था। 1950 का दशक आते-आते टाइपराइटर की लोकप्रियता लोगों के सार चढ़कर बोलने लगी। सरकारी कामकाज में इसका उपयोग जरूरी महसूस किया जाने लगा। इसी दौरान अमेरिकी कंपनी स्मिथ कोरोन ने दस लाख टाइपराइटर बेचकर रिकॉर्ड कायम किया। वर्ष 1953 में तो दुनिया भर में एक करोड़ 20 लाख टाइपराइटर बिके।

नब्बे के दशक के आगाज के साथ टाइपराइटर में एक बार फिर तब्दीली आई। उस दौरान सामान्य टाइपराइटर से डेढ़ गुना बड़े आकार का इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर बाजार में आया। इसमें मेमोरी थी, जिसमें कुछ प्रोफॉर्मा बनाकर सेव किए जा सकते थे। यह काफी लोकप्रिय हुआ, क्योंकि इसमें टाइपिस्ट को एक ही पत्र को बार बार टाइप नहीं करना होता था। फिर भी, इलेक्ट्रॉनिक टाइपराइटर की सांसें जल्द ही उखड़ गईं और इसका स्थान ले लिया कंप्यूटर ने।

कोर्ट-कचहरी और भवन-भूखंडों की रजिस्ट्री के लिए अर्जीनवीस कार्यालय में टाइपिंग की स्पीड देखकर लोग दांतों तले उंगली दबा लेते, जब वे टाइपिंग मशीन पर बैठे व्यक्ति को एक ही उंगली से फर्राटे के साथ टाइप करते देखते थे। टाइपिंग करने वाले का की-बोर्ड पर एक ही उंगली से निशाना गजब का होता था, जिसमें गलती की गुंजाइश ही नहीं होती थी। एक समय था जब टाइपिंग की परीक्षा ली जाती थी, जिसमें हर परीक्षार्थी को टाइपिंग मशीन साथ लाना अनिवार्य होता था। परीक्षा प्राप्त आवेदकों को स्टेनोग्राफर, टाइपिस्ट या क्लर्क की नौकरी में वरीयता भी मिला करती थी। एक समय ठक-ठक की आवाज के साथ गर्व से सीना ताने चलने वाला टाइपराइटर अब इतिहास की वस्तु हो गया है। कम ही जगहों पर टाइपराइटर दिखते हैं। भारतीय सिनेमा की जासूसी फिल्मों में टिक-टिक की आवाज के साथ शब्दों को कागज पर उतारने वाले टाइपराइटर के अक्षरों के माध्यम से अनेक अनसुलझी गुत्थियों को सुलझाया जाता रहा है। कोर्ट कचहरी, अर्जीनवीस, समाचार पत्र, सरकारी कार्यालयों आदि में टाइपराइटर की आवाज बहुत ही मधुर हुआ करती थी। कालांतर में इसका स्थान कम्पयूटर के बेआवाज की-बोर्ड ने ले लिया। अब तो हर जगह डेक्सटॉप या लैपटॉप की ही धूम है। अस्सी का दशक के बीतने तक टाइपिंग सिखाने वालों की दुकानें रोशन हुआ करती थीं।

नब्बे के दशक के आगाज के साथ ही कंप्यूटर ने अपनी आमद दे दी। धीरे-धीरे यह समाज पर छा गया। मुख्य तौर पर देखा जाए तो टाइपराइटर के लिए कंप्यूटर ही दुश्मन या सौतन साबित हुआ। टाईपिंग प्रशिक्षण के लिए खुले संेटर वीरान होने लगे, शॉर्टहैंड और टाइपिंग की विधा में से टाइपिंग भर जिंदा मानी जा सकती है, शॉर्टहैंड तो अब गुजरे जमाने की बात हो चली है। रही बात टाइपिंग सीखने की तो कंप्यूटर के की-बोर्ड पर उंगलियां चलाते-चलाते बच्चे आसानी से टाइपिंग सीखने लगे हैं। हिंदी की टाइपिंग जरा मुश्किल है, लेकिन अंग्रेजी की टाइपिंग बेहद आसान मानी जाती है। अब तो हिंदी के शब्दों के स्टिकर की-बोर्ड पर लगाकर बच्चे आसानी से हिंदी में टाइप करने लगे हैं। हालात देखकर लगने लगा है मानो बच्चे मां के पेट से ही टाइपिंग सीखकर आ रहे हैं। तीस साल की हो रही पीढ़ी इस परिवर्तन की साक्षात गवाह मानी जा सकती है जिसने ठक-ठक से लेकर बेआवाज की-बोर्ड तक का सफर अपनी नंगी आंखों से देखा होगा। इस पूरे बदलाव का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि टाइपराइटर की जवान पीढ़ी कंप्यूटर का की-बोर्ड आज भी लोकप्रिय टाइपराइटर कंपनी रेमिंगटन के नाम पर आज भी धड़ल्ले से चल रहा है।

हर चीज जो पैदा होती है उसका अंत अवश्य ही होता है। कहा जाता है कि मनुष्य और उसके द्वारा निर्मित हर प्रोडक्ट कभी न कभी मृत्यु को प्राप्त होता है। उसका अवसान सुनिश्चित है। ठक-ठक की ध्वनि के साथ शब्दों को कागज पर उकेरने वाले टाइपराइटर ने लगभग 300 सालों तक एकछत्र राज्य किया, अंत में वह कंप्यूटर के आगे घुटने टेकने पर मजबूर हो गया है। 

Monday, April 18, 2011

नई प्रौद्योगिकी से आसान होगी हवाई यात्रा


साझा इस्तेमाल वाले कियोस्क (टच स्क्रीन पण्राली वाला बूथ) और वेब तथा मोबाइल से चेक-इन करने की पण्राली जैसी नई विमानन प्रौद्योगिकियों से हवाई यात्रा आसान और उपभोक्ताओं के अनुकूल हो जाएगी। इस तरह की प्रौद्योगिकियों को देश के हवाई अड्डा परिचालनकर्ता और विमानन कंपनियां तेजी से अपना रही हैं। निकट भविष्य में जब आप दिल्ली हवाई अड्डे के टर्मिनल-3 पर महज हैंडबेग के साथ जाएंगे तो आप विमानन कंपनी के काउंटर पर चेक-इन किए बिना सीधे सुरक्षा द्वार में प्रवेश कर विमान में चढ़ सकेंगे। आपको महज अपना ई-टिकट या बोर्डिंग पास दिखाना होगा जिसे आप अपने घर या दफ्तर में बैठ कर विमानन कंपनी की वेबसाइट से हासिल कर सकेंगे। टिकट या बोर्डिंग पास को महज हवाई अड्डे के प्रवेश द्वार पर लगे कियोस्क पर दिखाना होगा। वैश्विक विमानन प्रौद्योगिकी कंपनी एआरआईएनसी के प्रबंध निदेशक (एशिया प्रशांत) जिम मार्टिन ने यहां बताया कि यह सब नई प्रौद्योगिकी 'वेरीपेक्स' के जरिये संभव हो सकेगा जिसका अभी टी-3 पर परीक्षण किया जा रहा है। इस कंपनी का मुख्यालय अमेरिका के एनापोलिस में है। कंपनी टी-3 पर यात्री चेक-इन और सामान संदेश पण्राली के 550 उपकरण पहले ही स्थापित कर चुकी है। विमानन कंपनी के काउंटर और दफ्तरों को ये नई पण्रालियां देने के साथ ही कंपनी ने 90 हैंड-हेल्ड स्केनर भी टी-3 पर लगाए हैं। इस तरह यह पण्राली प्रति घंटे 12,800 नग सामान की जांच कर सकती है। सुरक्षा बढ़ाने के लिए एआरआईएनसी ने टी-3 पर अपनी नई वेरीपेक्स एसएम सेवा शुरू की है जो भारत के किसी भी हवाई अड्डे पर पहली बार अपनाई जा रही है। बोर्डिंग पास की वैधता जांचने और सुरक्षित क्षेत्र में फर्जी यात्रियों का प्रवेश रोकने के लिए सुरक्षा एजेंसियां वेरीपेक्स का इस्तेमाल करती हैं। नई प्रौद्योगिकियों का इस्तेमाल करते हुए एयर इंडिया और जेट एयरवेज ने 'मोबाइल चेक-इन' सेवा शुरू की है जिनसे यात्री मोबाइल फोन के जरिये चेक- इन कर सकते हैं। जेट ने यह सेवा अपने फ्रीक्वेंट फ्लायर्स के लिए शुरू की है और इसे जल्द ही विस्तार दिया जाएगा। मोबाइल फोन पर बार कोड वाले बोर्डिंग पास के इस्तेमाल के बारे में पूछे जाने पर मार्टिन ने कहा-''हम इस प्रौद्योगिकी को भारत में लाने के बेहद करीब हैं। हम कई सारी भारतीय विमानन कंपनियों के साथ काम कर रहे हैं।''

Tuesday, April 12, 2011

सिर्फ दस साल के लिए कंपनियों को मिलेंगे लाइसेंस, नई दूरसंचार नीति में होगा प्रावधान


स्पेक्ट्रम आवंटन में गड़बड़ी पर मौजूदा विवादों के बीच केंद्र सरकार ने टेलीकॉम कंपनियों के लिए आवंटित लाइसेंस फीस की अवधि को मौजूदा 20 वर्ष से घटा कर 10 वर्ष करने की योजना बनाई है। इस वर्ष के अंत तक घोषित होने वाली राष्ट्रीय टेलीकॉम नीति-2011 में इस बारे में विस्तार से प्रावधान किए जाएंगे। साथ ही सरकार ने यह भी कहा है कि जिन कंपनियों को अपने लाइसेंस का नवीकरण करवाना होगा उन्हें लाइसेंस समाप्त होने से ढाई वर्ष पहले इस बारे में आवेदन करना होगा। संचार व सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने सोमवार को संवाददाता सम्मेलन में बताया कि मौजूदा दूरसंचार कंपनियों के लाइसेंस अब 10 वर्षो के लिए ही बढ़ाए जाएंगे। इसके लिए कंपनियों को लाइसेंस खत्म होने की अवधि से 30 महीने पहले आवेदन करना होगा, ताकि सरकार को फैसला लेने के लिए पर्याप्त समय मिले। नई दूरसंचार नीति-2011 के तहत सरकार दूरसंचार क्षेत्र में विलय व अधिग्रहण के मौजूदा नियमों को भी उदार बनाएगी। हालांकि इस बात का ख्याल रखा जाएगा कि किसी भी सर्किल में सरकारी कंपनी बीएसएनएल सहित टेलीकॉम कंपनियों की संख्या छह से कम न हो। संचार मंत्री की यह घोषणा आने वाले दिनों में देश में संचार सुविधाओं को महंगा कर सकती है। कंपनियों को लाइसेंस और स्पेक्ट्रम के लिए अलग-अलग फीस देनी होगी। यह फीस बाजार मूल्य के आधार पर तय होगी। यानी कंपनियों की लागत बढ़ेगी और उन्हें इसकी भरपाई अब सिर्फ 10 वर्षो में करनी होगी। जानकारों का मानना है कि सरकार अगर यह कदम उठाती है तो इसका फायदा उन टेलीकॉम कंपनियों को ज्यादा होगा जिन्होंने वर्ष 2007-08 में विवादों में घिरे पूर्व संचार मंत्री ए. राजा से स्पेक्ट्रम हासिल किए थे। इन कंपनियों को वर्ष 2028 तक के लिए लाइसेंस मिले हैं। एयरटेल, वोडाफोन जैसी पुरानी कंपनियों पर नई नीति जल्दी लागू होगी। इन कंपनियों के लाइसेंस अगले कुछ वर्षो के भीतर खत्म होने हैं। जाहिर है कि इन्हें नए लाइसेंस लेने के लिए ज्यादा कीमत देनी होगी। सिब्बल का संकेत साफ था कि लाइसेंस नवीकरण की फीस दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) के प्रस्ताव के मुताबिक तय होगी। ट्राई ने कुछ महीने पहले ही स्पेक्ट्रम की कीमत मौजूदा दर से छह गुणा ज्यादा वसूलने का प्रस्ताव किया है। बहरहाल, सिब्बल ने भविष्य में स्पेक्ट्रम से संबंधित हर तरह के फैसले नए राष्ट्रीय कानून के तहत करने का आश्वासन दिया। इसके लिए एक राष्ट्रीय स्पेक्ट्रम कानून बनाया जाएगा। इसका मसौदा तैयार करने के लिए सेवानिवृत्त न्यायाधीश शिवराज बी. पाटिल की अध्यक्षता में एक समिति गठित की गई है। साथ ही सरकार टेलीकॉम कंपनियों के पास उपलब्ध स्पेक्ट्रम की ऑडिटिंग बाहरी एजेंसी से करवाने की व्यवस्था भी कर रही है|

Thursday, April 7, 2011

मोबाइल फोन की अति के सबक


भूमंडलीकरण के इस दौर में दुनिया सिमट गई है और जीवन-शैली में आए कोई भी सुविधाजनक या आकर्षक बदलाव दुनिया भर में बहुत तेजी से फैल सकते हैं। ऐसे कुछ बदलाव विशेष औद्योगिक उत्पादों से जुड़े होते हैं। इन उत्पादों को बेचने वाले भी उन बदलावों को बेहद आकर्षक ढंग से प्रस्तुत करते हैं। हाल के वर्षो में जीवन शैली बदलने वाला जो उत्पाद दुनिया में, विशेषकर हमारे देश में सबसे तेजी से फैला है वह है मोबाइल फोन। न केवल तेजी से मोबाइल फोन का उपयोग करोड़ों लोगों तक फैल गया है अपितु प्रति उपभोक्ता इसके उपयोग की अवधि भी लगातार बढ़ती जा रही है। इस तरह जब किसी नई तकनीक या उत्पाद का तेज प्रसार होता है, तो यह संभावना बनी रहती है कि इससे जुड़े खतरे भी उतनी ही तेजी से फैल जाएं। जिस तेजी से मोबाइल फोन जैसे नए उत्पाद का प्रसार हुआ है उसमें समय पर चेतावनी मिलने की संभावना कम हो जाती है। मान लीजिए कि कुछ खतरे दस वर्ष के बाद सामने आने की संभावना हो लेकिन इस अवधि तक करोड़ों लोग मोबाइल फोन का भरपूर उपयोग कर चुके होंगे और उनको इसके उपयोग की इतनी आदत बन चुकी होगी कि वे खतरे का पता चलने पर भी इसका उपयोग कम नहीं कर पाएंगे। ऐसे में नई तकनीकों का तेज प्रसार भी कई खतरों से भरा है। मोबाइल फोन के तेज प्रसार को प्रगति के प्रतीक के रूप में प्रचारित किया गया है। विज्ञापन व प्रचार-प्रसार भी सबसे अधिक इस उत्पाद का हुआ है। जब किसी उत्पाद के साथ इतने बड़े आर्थिक हित जुड़े हों तो जाहिर है इसके खतरों या दुष्परिणामों को छिपाने या कम दर्शाने के प्रयास भी किए जाते हैं। इस कारण प्राय: महत्वपूर्ण जानकारी उपभोक्ताओं तक समय पर नहीं पहुंचती है। निश्चय ही लोगों को मोबाइल फोन से बहुत लाभ नजर आये, तभी उन्होंने इतनी तेजी से इसे अपने जीवन का जरूरी हिस्सा बनाया। पर सवाल यह है कि यदि उन्हें मोबाइल फोन से जुड़े सभी खतरों की पूरी जानकारी होती तब उनकी क्या प्रतिक्रिया होती? अब देर से ही सही, पर मोबाइल फोन से जुड़े विभिन्न खतरों के बारे में प्रामाणिक जानकारी उपलब्ध होने लगी है। भारतीय सरकार के संचार व सूचना तकनीक मंत्रालय ने हाल में मोबाइल फोन से जुड़े खतरों के अध्ययन के लिए एक अंतरमंत्रालय समिति का गठन किया। जिसने अपनी रिपोर्ट में बताया कि मोबाइल फोन व इनके टावर से निकलने वाले रेडियेशन या विकिरण से स्वास्थ्य संबंधी कई खतरे जुड़े हैं जैसे याददाश्त कमजोर होना, ध्यान केंद्रित न कर पाना, पाचन तंत्र में गड़बड़ी होना, अनिद्रा, सिरदर्द, थकान, हृदय स्पंदन, प्रतिक्रिया में देरी आदि। समिति ने बताया कि चिड़िया-गौरेया, मधुमक्खी, तितली, आदि कीटों की संख्या में कमी के लिए भी मोबाइल टावर से होने वाले रेडियेशन बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। इससे पहले जेएनयू के प्रो. जितेंद्र बेहारी का इस विषय पर अनुसंधान भी सुर्खियों में आया था। इस अनुसंधान का निष्कर्ष यह है कि मोबाइल का अधिक समय तक इस्तेमाल करना खतरनाक तो अवश्य है, पर यह कितना घातक होगा यह कई बातों पर निर्भर होगा- जैसे कि मोबाइल फोन का उपयोग करने वाले व्यक्ति की उम्र कितनी है, उसे पहले से कौन सी बीमारी है, वह कितने समय तक फोन उपयोग करता है तथा उसके फोन की क्वालिटी कैसी है। विशेष परिस्थितियों में मोबाइल फोन का उपयोग हृदय रोग, दिमाग का कैंसर, आर्थराइटिस, अल्जाइमर, नपुसंकता तथा जल्द बुढ़ापा आने की संभावना बढ़ा सकता है। मोबाइल के अधिक उपयोग से रेडिएशन शरीर का पानी भी सोख लेता है जिससे कारण कई बीमारियां उत्पन्न होती है। मोबाइल फोन तथा इसके टावर से सबसे अधिक खतरा छोटे बच्चों को है। इसलिए छोटे बच्चों को इसके कुप्रभाव से बचा कर रखना सबसे जरूरी है। इस खतरे को कम करने के लिए कुछ सावधानियां बरती जा सकती हैं। जहां तक संभव हो, लैंड लाईन फोन का उपयोग करना चाहिए। मोबाइल का उपयोग बेहद जरूरी बात के लिए करना चाहिए। लंबी बात मोबाइल पर नहीं करनी चाहिए। कमजोर सिग्नल की स्थिति में भी मोबाइल के उपयोग से बचना चाहिए क्योंकि ऐसे में रेडिएशन ज्यादा निकलता है। फोन को पास रख कर न सोएं, विशेष तौर पर इसे सिर व तकिए से दूर रखें। रात में इसे स्विच ऑफ कर देना चाहिए। बच्चों को मोबाइल से दूर रखना बेहद जरूरी है। मोबाइल टावर के पास न रहें तथा इन्हें रिहायशी स्थान से हटाने के लिए कार्यवाही करने की जरूरत है। स्कूलों के निकट तो टावर कदापि नहीं होने चाहिए। इसके साथ ही सरकार को बड़ा नीतिगत फैसला लेना होगा कि यदि मोबाइल फोन का प्रचार-प्रसार किया जाए तो साथ ही इनके खतरों व इससे जुड़ी सावधानियों के बारे में भी लोगों को जानकारी देनी होगी। सरकार को स्वयं भी इन खतरों व सावधानियों का प्रचार-प्रसार करना चाहिए। टावर संबंधी स्पष्ट व सख्त नीतियां अपनाई जानी चाहिए ताकि इनके रेडिएशन की चपेट में आकर किसी का स्वास्थ्य तबाह न हो। मोबाइल उपभोक्ता भी बेहतर क्वालिटी व बचाव साधनों से लैस मोबाइल फोन खरीदकर अपने लिए खतरे कम कर सकते हैं, हालांकि गरीब उपभोक्ताओं के लिए ऐसा बचाव कठिन है। इसके साथ ही अन्य तरह के इलैक्ट्रोमेगनैटिक प्रदूषण को कम करने के प्रयास भी जरूरी हैं। गर्म जलवायु व शरीर की कमजोरी के कारण भी भारत में यह खतरे पश्चिमी विकसित देशों से अधिक हैं।