Pages

Saturday, October 13, 2012

भारत के अंतरिक्ष में बढ़ते कदम




पिछले दिनों इसरो द्वारा अंतरिक्ष में अपने 100वें अंतरिक्ष मिशन की सफलता के बाद देश के अब तक के सबसे भारी संचार उपग्रह जीसेट-10 को दक्षिण अमेरिका के फ्रेंच गुयाना स्थित कौरौ लांचपैड से एरियन-5 रॉकेट के जरिये सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया गया। यह उपग्रह दूरसंचार, डायरेक्ट-टू-होम प्रसारण और नागरिक उड्डयन की जरूरतें पूरी करेगा। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा निर्मित 3400 किलोग्राम वजनी जीसैट-10 अब तक का सबसे भारी संचार उपग्रह है। यह नवंबर से अपना काम शुरू करेगा और 15 साल तक काम करता रहेगा। इसे भारत के 101वें अंतरिक्ष अभियान अच्छा स्वास्थ्य के तहत प्रक्षेपित किया गया। जीसैट-10 में 30 संचार अभिग्राही हैं। 12 कू-बैंड में, 12 सी-बैंड में और छह अभिग्राही विस्तारित सी-बैंड में लगे हैं। इसके अलावा इसमें एक नकारात्मक अंतरिक्ष उपकरण गगन लगाया गया है, जो परिष्कृत शुद्धता के जीपीएस संकेत मुहैया कराएगा। भारतीय हवाईअड्डा प्राधिकरण इस उपकरण का उपयोग नागरिक उड्डयन की जरूरतें पूरी करने के लिए कर सकेगा। जीपीए एडेड जियो ऑग्मेंटेड को संक्षेप में गगन कहा जाता है। मई 2011 में जीसैट-8 के प्रक्षेपण के बाद यह दूसरा उपग्रह है, जिसे अंतरिक्ष उपकरण गगन के साथ इनसेट या जीसैट उपग्रह समूह में शामिल किया गया है। 19 अप्रैल 1975 को स्वदेशी उपग्रह आर्यभट्ट के प्रक्षेपण के साथ अपने अंतरिक्ष सफर की शुरूआत करने वाले इसरो की यह सफलता भारत के अंतरिक्ष में बढ़ते वर्चस्व का संकेत है । 22 अक्टूबर 2008 को मून मिशन की सफलता के बाद इसरो का लोहा पूरी दुनिया ने माना। चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी चंद्रयान-1 को ही मिला। अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में हम लगातार प्रगति कर रहे हैं, लेकिन अब भी हम पूरी तरह से आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। हमें आज भी विदेशों से ट्रांसपोंडर लीज पर लेने पड़ रहे हैं। इसरो को पीएसएलवी दूरसंवेदी उपग्रहों की प्रक्षेपण में दक्षता है, लेकिन संचार उपग्रहों के प्रक्षेपण के मामले में हम अभी आत्मनिर्भर नहीं हो पाए हैं। यही वजह है कि हमें जीसैट-10 का प्रक्षेपण विदेशी रॉकेट से कराना पड़ रहा है। क्रायोजेनिक तकनीकी के परिप्रेक्ष्य में पूर्ण सफलता न मिलने के कारण भारत इस मामले में आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है, जबकि प्रयोगशाला स्तर पर क्रायोजेनिक इंजन का सफलतापूर्वक परीक्षण किया जा चुका है। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन की सहायता से लांच किए गए प्रक्षेपण यान जीएसएलवी की असफलता के बाद इस पर सवालिया निशान लगा हुआ है। स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन के विकास में हम देर कर रहे हैं। 2010 में जीएसएलवी के दो अभियान विफल हो गए थे, अंतरिक्ष में लंबे समय तक टिकने के लिए हमें इस दिशा में अभी बहुत काम करना है क्योंकि अंतरिक्ष अब बहुत महत्वपूर्ण हो गया है और हमारा निकटतम प्रतिद्वंद्वी चीन कई मामलों में हमसे से काफी आगे चल रहा है। चीनी रॉकेट 9 टन का पेलोड ले जा सकते हैं, लेकिन भारतीय रॉकेट अभी 2.5 टन से ज्यादा भार ले जाने में सक्षम नहींहैं। इसलिए इस दिशा में लगातार काम करने की जरुरत है। इसरो के अध्यक्ष के. राधाकृष्णन की मानें तो भारत की अंतरिक्ष योजना भविष्य में मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन भेजने की है। फिर भी इस तरह के अभियान की सफलता सुनिश्चित करने के लिए अभी बहुत से परिक्षण किए जाने बाकी हैं। भारत 2016 में नासा के चंद्र मिशन का हिस्सा बन सकता है और इसरो चंद्रमा के आगे के अध्य्यन के लिए अमेरिकी जेट प्रणोदन प्रयोगशाला से भी साझेदारी कर सकता है। देश में आगामी चंद्र मिशन चंद्रयान-2 का कार्य प्रगति पर है। चंद्रयान-2 के 2014 में प्रक्षेपण की संभावना है। इसरो व रूसी अंतरिक्ष एजेंसी रोस्कॉस्मॉस का चंद्रमा के लिए संयुक्त मानव रहित अभियान मिशन चंद्रयान-2 रूस के नीतिगत निर्णय की प्रतीक्षा में अटक गया है। चीन के साथ साझा मिशन विफल हो जाने के मद्देनजर रूस अपने अंतरग्रही मिशनों की समीक्षा कर रहा है। इस पर सरकार को जल्दी फैसले के लिए रूस पर दबाव बनाना पड़ेगा। चंद्रयान-2 मिशन 2014 में प्रस्तावित है और इसे भू-समकालिक उपग्रह प्रक्षेपण यान (जीएसएलवी) एमके-2 से प्रक्षेपित किया जाना है। 1969 में प्रसिद्ध वैज्ञानिक विक्रम साराभाई के निर्देशन में इसरो का गठन हुआ था। तब से अब तक चांद पर अंतरिक्ष यान भेजने की परिकल्पना तो साकार हुई। अब हम चांद पर ही नहीं, बल्कि मंगल पर भी पहुंचने का सपना संजोने लगे हैं। इन प्रक्षेपित उपग्रहों से मिल रही सूचनाओं के आधार पर अब हम संचार, मौसम संबधित जानकारी, शिक्षा के क्षेत्र में, चिकित्सा के क्षेत्र में टेली मेडिसिन, आपदा प्रबंधन एवं कृषि के क्षेत्र में फसल अनुमान, भूमिगत जल के स्त्रोतों की खोज, संभावित मत्स्य क्षेत्र की खोज के साथ पर्यावरण पर भी निगाह रख पाने में कामयाब हो रहे हैं। कम संसाधनों और कम बजट के बाबजूद भारत आज अंतरिक्ष में कीर्तिमान स्थापित कर रहा है। भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत ऐसे ही विदेशी प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत से एक तिहाई भर है। इनसेट प्रणाली की क्षमता को जीसैट द्वारा मजबूत बनाया जा रहा है, ताकि दूरस्थ शिक्षा, दूरस्थ चिकित्सा ही नहीं बल्कि ग्राम संसाधन केंद्रों को भी इन्नत बनाया जा सके। पिछले दिनों ही इसरो ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में इतिहास रचते हुए अपने 100वें अंतरिक्ष मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दिया और पीएसएलवी सी21 के माध्यम से फ्रांसीसी एसपीओटी-6 को और जापान के माइक्रो उपग्रह प्रोइटेरेस को उनकी कक्षा में स्थापित कर दिया। पोलर सैटेलाइट लान्च व्हीकल (पीएसएलवी) फ्रांसीसी उपग्रह को लेकर अपनी 22 वीं उड़ान पर रवाना हुआ था। कुल 712 किलोग्राम वजन वाला यह फ्रांसीसी उपग्रह भारत द्वारा किसी विदेशी ग्राहक के लिए प्रक्षेपित सर्वाधिक वजन वाला उपग्रह है। इसरो अब तक 62 उपग्रह, एक स्पेस रिकवरी मॉड्यूल और 37 रॉकेटों का प्रक्षेपण कर चुका है। इससे दूरसंवेदी उपग्रहों के निर्माण और संचालन में वाणिज्यिक रूप से भी फायदा पहुंच रहा है। भविष्य में अंतरिक्ष में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। भारत के पास अपने पड़ोसियों की तुलना में कुछ बढ़त पहले से है। इसमें और प्रगति करके इसका बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक उपयोग भी संभव है। यदि भारत इसी प्रकार अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब हमारे यान अंतरिक्ष यात्रियों को चांद, मंगल या अन्य ग्रहों की सैर करा सकेंगे। भारत अंतरिक्ष विज्ञान में नई सफलताएं हासिल कर विकास को अधिक गति दे सकता है। इसरो के हालिया मिशन की सफलताएं देश की अंतरिक्ष क्षमताओं के लिए मील का पत्थर हैं, लेकिन इसरो को जीएसएलवी से जुड़ी अपनी कुछ असफलताओं से सबक लेते हुए जल्द से जल्द उन्हें दूर करना होगा। तभी भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में भी एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा। (लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं)

Dainik Jagran National Edition 11-10-2012 Pej-11 lwpuk ,oa izkS|ksfxdh

Monday, October 8, 2012

2017 तक 14 संचार उपग्रहों का प्रक्षेपण होगा




बेंगलूर, प्रेट्र : ट्रांसपोंडरों की भारी मांग पर भारत ने पांच सालों में यानी 2017 तक 14 संचार उपग्रह प्रक्षेपित करने की तैयारी की है। अंतरिक्ष विभाग के अनुसार 12वीं पंचवर्षीय योजना (2012-2017) में देश में 794 ट्रांस्पोंडरों की जरूरत पड़ेगी। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) इसे पूरा करने में जुटा है। इस वर्ष मार्च के अंत तक इनसैट और जीसैट उपग्रहों के जरिए जो ट्रांसपोंडर काम कर रहे हैं उनकी कुल संख्या 187 है। इन 14 प्रस्तावित उपग्रहों में मोबाइल संचार के लिए उच्च शक्ति वाले एस-बैंड सैटेलाइट और नई पीढ़ी के जियो-इमेंजिंग सैटेलाइट (भू-बिंब उपग्रह) शामिल रहेंगे। इसका मकसद ट्रांसपोंडरों की क्षमता बढ़ाने और नई पीढ़ी के ब्रॉड बैंड वीसैट और केए बैंड प्रणालियों की शुरुआत करना है। ये उपग्रह देश की सभी जरूरतों को पूरी करने के लिए ट्रांसपोंडरों की मांग और आपूर्ति की खाई पाटने का काम करेंगे। इसके अलावा आकस्मिक जरूरतों के लिए पर्याप्त ट्रांसपोंडर खाली भी रहेंगे। अंतरिक्ष विभाग के शोध एवं विकास विंग इसरो के सूत्रों ने यह जानकारी दी। बारहवीं पंचवर्षीय योजना में पीएसएलवी के 16 और जीएसएलवी एमके-टू के छह और जीएसएलवी एमके-थ्री के दो अभियानों की योजना है। इसरो के बेंगलूर स्थित मुख्यालय के अनुसार, बारहवीं पंचवर्षीय योजना में कुल 58 अभियानों की योजना बनाई गई है। इनमें से 33 सैटेलाइट मिशन और 25 लांच वेहिकल मिशन हैं। इसके अलावा, पीएसएलवी और जीएसएलवी के संदेशों की मदद से राडार अंतरिक्ष में उपग्रह के कचरे से भारतीय सैटेलाइटों को बचाए रखने का भी काम करेगा। योजना आयोग ने इस पंचवर्षीय योजना में अंतरिक्ष विभाग के कार्यक्रम मद में 47500 करोड़ रुपये आवंटन की संस्तुति की है। गैर योजना मद का बजट मिलाकर यह करीब 55 हजार करोड़ रुपये हो जाएगा।
  Dainik Jagran National Edition 7-10-2012 lwpuk ,oa izkS|ksfxdh   Pej-14

Tuesday, September 18, 2012

विज्ञान-अनुसंधान में पिछड़ा भारत



ठ्ठ जागरण ब्यूरो, श्रीनगर पिछले कुछ वर्षो में भारत विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में पिछड़ा है। यह बात उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने सोमवार को कश्मीर विश्वविद्यालय में आठवीं जम्मू-कश्मीर नेशनल साइंस कांग्रेस के उद्घाटन समारोह में कही। उन्होंने कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए विज्ञान को और ज्यादा लोकप्रिय बनाने और युवा वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करने पर बल दिया। साथ ही वैज्ञानिक खोजों व प्रौद्योगिकी को यथासंभव आम जीवन में लागू करने के लिए जल्द ही देश में एक नई विज्ञान नीति बनाए जाने का संकेत दिया। उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं को ज्यादा स्वायत्तता के साथ मतभेद की पर्याप्त स्वतंत्रता वाली नई शोध संस्कृति को विकसित करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि कुछ वर्षो में हमारा देश विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में पिछड़ा है। हमारे जीडीपी का कुल 0.9 फीसद ही अनुसंधान और विकास पर खर्च किया जा रहा था। हालांकि प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने यकीन दिलाया है कि वह 12वीं योजना के अंत तक इसे जीडीपी के दो प्रतिशत तक ले जाएंगे। विज्ञान के प्रति आम लोगों को जागरूक बनाने, युवाओं में विज्ञान के प्रति रुचि पैदा करने के लिए हम तभी उन्हें प्रेरित कर सकते हैं, उनके सामने रोल मॉडल पेश कर सकते हैं, जब हम अनुसंधान, शोध और अध्यापन में रुकावटें दूर करें। इसके लिए जरूरी है कि अंडर-ग्रेजुएट स्तर पर प्रसिद्ध रिसर्च स्कॉलर और अध्यापक पढ़ाने के लिए आगे आएं। उन्होंने एक वैज्ञानिक का उल्लेख करते हुए कहा कि सफल शोधकर्ता या वैज्ञानिक अपनी ही धुन में सफलता की तरफ बढ़ता है। वर्तमान में हमारे सामने तीन चुनौतियां हैं। विज्ञान में रुचि रखने वालों को बचपन में चिह्नित करना, उनका संरक्षण व योग्य मार्गदर्शन करना और उनमें वैज्ञानिक प्रतिभा को विकसित करते हुए उन्हें हमेशा ही इसी क्षेत्र से जुड़ रहने के लिए तैयार करना। इससे हम शोधकर्ताओं और अध्यापकों की एक बेहतर पौध तैयार कर सकेंगे। उपराष्ट्रपति ने कहा कि जम्मू-कश्मीर विज्ञान, प्रौद्योगिकी शिक्षा और अनुसंधान के लिए आवश्यक अवसंरचना को लेकर कई दिक्कतों से जूझ रहा है। इनमें अधिकांश मुश्किलों को स्थानीय युवाओं और नौजवान वैज्ञानिकों द्वारा केंद्र सरकार द्वारा विज्ञान में रुचि और विकास के लिए संचालित योजनाओं को अपनाकर, दूर किया जा सकता है। इसके अलावा जम्मू कश्मीर में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी को लोकप्रिय बनाने के लिए समय समय पर घोषित किए जाने वाले पैकेजों को सही तरीके से अमल में लाया जाना जरूरी है। यह व्यावहारिक ही नहीं हमारी नैतिक जिम्मेदारी भी है। समारोह में विश्वविद्यालय के कुलपति राज्यपाल एनएन वोहरा, प्रो. चांसलर मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला, उपकुलपति प्रो. तलत अहमद और इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी (इनसा) के अध्यक्ष मौजूद थे। उपराष्ट्रपति ने इस अवसर पर विभिन्न क्षेत्रों में अनुसंधान और खोज के लिए राज्य के दस युवा वैज्ञानिकों को भी

दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण पेज -4,18-9-2012 (lwpuk ,oa izkS|ksfxdh